जयपुर में प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में रति सक्सेना की पांच पुस्तकों का विमोचन किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित ने कहा कि रति सक्सेना हिंदी साहित्य में एक जीवंत उदाहरण हैं, जिन्होंने पिछले 50 वर्षों से निरंतर लेखन किया है। कृष्ण कल्पित ने बताया कि रति सक्सेना हिंदी की एकमात्र ऐसी कवयित्री हैं, जिन्होंने अपनी कविताओं के बल पर 45 देशों की यात्रा की है और विश्व के कई कविता महोत्सवों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उनकी रचनाओं में ऋग्वेद की परंपरा के साथ-साथ वैश्विक चेतना का समावेश है। वरिष्ठ कवयित्री अजंता देव ने कहा कि हिंदी साहित्य में उपेक्षा कोई नई बात नहीं है और साहित्यिक पहचान दिल्ली-केंद्रित है। उन्होंने यह भी कहा कि अच्छा काम देर-सवेर पहचान अवश्य पाता है। कृष्ण कल्पित ने रति सक्सेना की भाषा की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके पास संस्कृतनिष्ठ और परिमार्जित भाषा है, जो उनके जीवन के गहन अनुभवों को प्रतिबिंबित करती है। उन्होंने वर्तमान हिंदी कविता की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आजकल ऐसी किताबें छप रही हैं, जिन्हें कबाड़ी भी खरीदने को तैयार नहीं है। ऐसे में रति सक्सेना के समग्र रचना का मूल्यांकन आवश्यक है। इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ हेतु भारद्वाज ने कहा कि लेखक में ठहराव जरूरी है। उसे अपने प्रति निर्मम होना चाहिए क्योंकि यह निर्ममता ही उसे शिखर तक ले जा सकती है। लेखक में सेल्फ क्रिटिसिज्म की भावना होनी चाहिए तभी लेखक और रचना के साथ न्याय हो सकता है। उनका कहना था कि छह किताबों पर एक साथ चर्चा कराना किसी पुस्तक के साथ न्याय नहीं है । लेखक का काम लिखना है, प्रचार करना नहीं । प्रचार करना तो प्रकाशक का काम है ।


