राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 साल पूरे हो चुके हैं। देशभर में इसको लेकर भी कई कार्यक्रम हो रहे हैं। इसी बीच जोधपुर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कन्हैयालाल राजपुरोहित की लिखी आध्यात्मिक राष्ट्रवाद पुस्तक भी चर्चा में हैं। जिन्हें उन्होंने आज से 32 साल पहले लिखा था। इस किताब में उन्होंने राष्ट्रगीत के रचयिता बंकिम चन्द चट्टोपाध्याय के बारे में विस्तार से लिखा। उन्होंने कहा कि आज वंदे मातरम् गीत को लेकर कुछ लोग विरोध कर रहे हैं, लेकिन जब उसे लिखा गया तब खुद इस्लाम धर्म को मानने वाले नेताओं ने भी इसका समर्थन किया था। उन्होंने आज वंदे मातरम् लेकर छिड़ी बहस पर कहा कि ये विरोध करना दुर्भाग्य पूर्ण है। वो इसलिए कर रहे हैं की विरोध का शुद्ध राजनीतिक कारण और कुछ भी नहीं है। एक अपना विशेष वोट बैंक है उसको जो प्रसन्न करने के लिए है। वास्तविकता यह है की उस समय जब पहले पहल इसके बारे में आपत्ति उठाई गई थी तब भी जो सही दृष्टि से सोचने वाले जो मुस्लिम नेता है। उन्होंने कहा कि इसमें कहीं भी बुतपरस्ती की कोई गंध नहीं है और ये हमारी जो जिसे हम मदर ए वतन कहते है उर्दू में वही मातृभूमि है। उसकी वंदना है तो उसमें कोई धर्म से कोई लेना देना नहीं है। तो ये तो सबसे बड़ी बात ये है आपने देखा होगा की राष्ट्र गीत के रूप में इसे जब पूरा अपनाया गया तो उसको पूरा नहीं अपनाया गया। सिर्फ ऊपर के जो दो पद हैं वो काम में लिए गए हैं। उनमें तो ना तो लक्ष्मी का नाम है, ना सरस्वती है। ना दुर्गा का नाम है, उसके बावजूद भी उस पर जो है एक हठधर्मिता जो है इसको नहीं कहें। मतलब कहने का है कि यदि आप अपनी परम्परा से आप नहीं जुड़ेंगे तो आप किसी भी रूप में आप उर्जावान बन नहीं सकते। राजपुरोहित ने बताया कि यह किताब आधुनिक भारतीय चिंतन की एक बहुत महत्वपूर्ण शाखा आध्यात्मिक राष्ट्रवाद से संबंधित है। इसमें 6 चिंतक है। जिसमें सबसे पहले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय है। इसके अलावा स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, श्री अरविंद, विपिन चंद्र पाल, लोकमान्य तिलक है। इसमें आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की विचारधारा के सूत्रधार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय थे। वो भावना जगत के कुशल शिल्पी थे। उपन्यासकार भी थे। उस समय भारत की उन्होंने दुर्दशा देखी और हतोत्साहित भारत देखा। जिस समय हर कोई दीनहीन अपने आप को समझ रहा था। उस समय भारतीयों में ऊर्जा का संचार करने ओर देशभक्ति की भावना भरने के लिए एक उपन्यास आनंद मठ में लिखा। आनंद मठ में ये गीत वंदे मातरम् समाहित है। ये गीत मातृभूमि की वंदना है। इसमें मातृभूमि की यशगाथा का वर्णन है। उसको इस रूप में चित्रित किया गया है कि ये गीत किस प्रकार से पुष्ट बनाने वाली शक्ति दायिनी मां है। यानी ये कोई भूखंड मात्र नहीं है। उन्होंने एक दैवीय सत्ता के रूप में उसका दैवीकरण किया की ये मातृभूमि हमारे जीवन में प्रकाश बिखेर रही है। बंकिम ने अपने इस गीत में बताया कि हमारी पूज्य शक्तियां दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती का सत्व है जो मातृभूमि में है जो राष्ट्रवाद का यूरोपीय दृष्टिकोण है वो उससे बिल्कुल भी सहमत नहीं है। उसको एक दैवीय शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। मां और संतान का जो संबंध है उस रूप में उसका रखा की मां कैसे हमे परिपुष्टि प्रदान करती है और संतान के रूप में हमारा क्या कर्तव्य है। तब देश के लिए बलिदान करने की तत्परता लोगों में जो भाव है हीन भावना उनकी दूर हुई साहस का संचार हुआ। वो तभी हुआ जब मातृभूमि का एक उज्जवल स्वरूप उनके सामने रखा गया। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय सही नाम उन्होंने बंकिम चंद्र चटर्जी पर कहा कि इनका पूरा नाम बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय है। बंगाल में जो लंबे लंबे सरनेम ब्राह्मणों के थे, जिसमें चटोपाध्याय, मुखोपाध्याय ये गंगोपाध्याय इन नामों को अंग्रेज सही से बोल नहीं पाते थे, इसलिए उन्होंने चट्टोपाध्याय का चटर्जी कर दिया, मुखोपाध्याय का मुखर्जी कर दिया, गंगोपाध्याय का गांगुली कर दिया, इसलिए ये चट्टोपाध्याय ही है। चटर्जी जो है वो विकृत रूप है। संन्यासियों ने किया था विद्रोह डॉ. कन्हैयालाल राजपुरोहित ने बताया कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत की रचना 1876 में कर दी थी। आनंद मठ उन्होंने बाद में लिखा, क्योंकि बाद में उस उपन्यास की जो कथा वस्तु थी वो था बंगाल का सन्यासी विद्रोह। उस समय जो ईस्ट इंडिया कंपनी का निर्मम शासन था, उसके विरुद्ध संन्यासियों ने आवाज़ उठाई थी, विद्रोह किया था तो उस पृष्ठभूमि में उन्होंने ये जो गीत था वो बाद में आनंद मठ में जोड़ दिया।


