लोक निर्माण विभाग में मिस्त्री के पद पर दैनिक वेतनभोगी के रूप में भर्ती हुए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को 8-10 हजार रुपए की पेंशन नहीं देना पड़े, इसके लिए सरकार ने 27 साल अदालत में संघर्ष किया। खास बात यह है कि इस पर सरकार का खर्च भी 10 से 12 लाख रुपए तक हो गया। कर्मचारी की सरकार से लड़ते-लड़ते जान चली गई, पर शासन ने कोर्ट के किसी भी आदेश का पालन नहीं किया। हाई कोर्ट ने नियमित करने का आदेश दिया तो रिटायर होने तक पालन नहीं किया। पेंशन मांगी तो इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने पेंशन देने के आदेश दिए तो सरकार सुप्रीम कोर्ट तक मामले को ले गई। 38 साल नौकरी करने के बाद रिटायर हुए कर्मचारी के लिए सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने दलील दी कि जिस पद पर नियुक्त किया था वह पद था ही नहीं? इसलिए उन्हें नियमित नहीं किया। वहीं कर्मचारी की मृत्यु हो चुकी है तो याचिका को निरस्त कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए आदेश दिए कि कर्मचारी के रिटायर होने की तारीख से हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के आदेश होने तक पेंशन की जाए। वहीं उसकी मृत्यु होने के बाद पत्नी को परिवार पेंशन का लाभ दिया जाए। छह फीसदी ब्याज भी चुकाने के आदेश कोर्ट ने दिए हैं। सिर्फ मदनलाल ही पीड़ित नहीं अधिवक्ता आनंद अग्रवाल का कहना है कि हाई कोर्ट में इस तरह के सैकड़ों मामले लंबित हैं। लेबर कोर्ट, इंडस्ट्री कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करते हुए सरकार ने हाई कोर्ट में अपील पेश कर रखी है। हैंडपंप सुधारने वाला, प्यून, मेसन जैसे छोटे पद वालों को नियमित करने के बजाए जबरन कोर्ट में अपील दायर कर समय खराब किया जा रहा है छोटे से पद के लिए सरकार की इतनी लंबी लड़ाई


