पुशांत मोदगिल| लुधियाना लोहड़ी के त्योहार को सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए लुधियाना शहर के कारीगर चाइना डोर के विकल्प के रूप में सूती धागे से पतंग की डोर तैयार कर रहे हैं। कारीगरों का कहना है कि यह डोर न केवल सुरक्षित है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह नहीं है। सूती धागे की डोर टूटने के बाद जमीन में मिल जाती है, जिससे किसी प्रकार का खतरा नहीं रहता। पुराने समय की रंगीन पतंगबाजी आसमान में फिर लौट रही है। वर्षों तक चाइनीज डोर ने इस खेल को खतरनाक बना दिया था। लेकिन अब लोग वापस पारंपरिक सूती धागे की ओर लौट रहे हैं। दरेसी ग्राउंड और शहर के प्राचीन रेशमी मांझे की दुकानें फिर से जीवन पसीना रही हैं। सुरिंदर कुमार और रमेश कुमार जैसे कारीगर दशकों से यह कला संभाले हुए हैं। उनका कहना है कि हाथ से बने मांझे न केवल सुरक्षित हैं, बल्कि पर्यावरण और पक्षियों के लिए भी हितकारी हैं। लुधियाना के प्राचीन दरेसी ग्राउंड में रमेश कुमार पिछले 30 सालों से पारंपरिक मांझा तैयार कर रहे हैं। 50 वर्षीय रमेश का कहना है कि यह काम केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि एक साधना है। वे कच्चे धागे को लकड़ी के डंडों पर तानते हैं, ग्राहकों की पसंद के अनुसार रंगों से संवारते हैं और धूप में सुखाते हैं। कहा कि उनके मांझे में किसी घातक केमिकल का उपयोग नहीं होता। अरारोट और पीसे हुए कांच के मिश्रण से बनी यह डोर पूरी तरह प्राकृतिक और सुरक्षित है। सुखाने के बाद चरखी पर लिपटने पर इसकी मजबूती बेमिसाल होती है। आज बाजार में चाइनीज डोर ने अपनी जगह बना ली है, जिसे रमेश कातिल डोर कहते हैं। फिर भी उनकी बनाई डोर की मांग बढ़ रही है। सुरिंदर कुमार ने बताया कि हमारी दुकान सिर्फ धागा नहीं बेचती, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत सहेजती है। यह कला 1947 में लाहौर से हमारे शहर आई है। मेरे पिता स्वर्गीय कुंत प्रकाश लाहौरिया ने इसे शुरू किया, और मैं पिछले 57 सालों से इसे आगे बढ़ा रहा हूं। कहा कि मांझा सिर्फ धागा नहीं, मेहनत, मौसम और अनुभव का मेल है। इस मांझे की ताकत इसके कच्चे मटेरियल में छिपी है, जिसे वर्धमान मिल का सबसे उत्तम क्वालिटी का सूती धागा व अमृतसर से विशेष तौर पर मंगाया गया खास कांच इस्तेमाल किया जाता है। अक्टूबर से जनवरी तक की नमी और धूप में तैयार किया गया सूती मांझा, खास कांच और बेहतरीन कच्चे माल से बनाया जाता है। चाइना डोर के दौर में भी हाथ से बने इस पारंपरिक मांझे की पहचान कायम है। सुरिंदर कुमार


