राज्य संग्रहालय के प्रतिमा दीर्घा में 10वीं से 12वीं शताब्दी की कई मूर्तियां वहां आने वाले दर्शकों को आकर्षित करती हैं। हिंदू, बौद्ध, जैन धर्म की ये मूर्तियां अपने इतिहास के साथ उस काल की संस्कृति को भी दिखाती हैं। रिसर्च के लिए देशभर के स्कॉलर यहां आते हैं। अब यहां एक और नायाब मूर्ति को दर्शक कुछ महीनों में देख पाएंगे। यह ललिता देवी की खूबसूरत मूर्ति है जो पाकुड़ जिले के महेशपुर के गांव कुलबोना में बानसलोई नदी के पास मिली थी। सांस्कृतिक केंद्र रहा है पाकुड़-गोड्डा वहीं आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया के सहायक अधीक्षण पुराविद् डॉ. नीरज कुमार मिश्रा ने बताया कि यह मूर्ति 9-10वीं शताब्दी की है, जिस समय बिहार-बंगाल में पाल वंश का शासन था। पाल वंश का क्लासिकल पीरियड 9वीं से 12वीं शताब्दी तक माना जाता है। झारखंड का पाकुड़, गोड्डा पाल वंश के समय उनके सांस्कृतिक क्षेत्राधिकार में पड़ता था। यह क्षेत्र फरक्का होते हुए बांग्लादेश तक जाता था। नदी किनारे यह मूर्ति मिली है, इसका मतलब है कि इसे कहीं स्थापित करने के लिए ले जाया जा रहा होगा और कोई कारण से नदी में गिर गई। मां ललिता की मूर्तियां बंगाल और बांग्लादेश में भी मिलती हैं। अग्नि पुराण व मार्कण्डेय पुराण में है वर्णन राज्य संग्रहालय की संग्रहालय गाइड निर्मला तिर्की ने बताया कि यह मूर्ति देवी ललिता की है जिनके बारे में अग्नि पुराण में चर्चा है कि वे मां पार्वती का एक रूप हैं। इनकी चर्चा मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा सप्तशती खंड में भी मिलता है। इसे क्लोराइटॉइड फिलाइट या ब्लैक बेसाल्ट या असिताश्म पत्थर से बनाया गया है जो एक प्रकार का आग्नेय चट्टान है। यह ज्वालामुखी के उद्गार से बनता है। देवी ललिता की 4 भुजाएं हैं जो कमल पर खड़ी हैं। उनके साथ दोनों पुत्र कार्तिकेय व गणेश हैं। वे हाथों में आयुध, कलश, माला और वरद मुद्रा में हैं। चारोंओर फूलों से सजाया गया है। दोनों तरफ केले के पेड़ हैं। नीचे शेर और वृषभ बैठे हुए हैं। इसके साथ हिरण, हाथी, पक्षी को भी देखा जा सकता है। गले और हाथों में गहने हैं।


