स्वच्छता सर्वेक्षण-2024 की रैंकिंग में एक बार फिर रांची फिसड्डी साबित हुई। पिछली बार के मुकाबले रांची पांच रैंक गिरकर 37 वें पायदान पर पहुंच गई। पिछले पांच वर्षों से रांची टॉप 30 में भी जगह नहीं बना पा रही है। जबकि, रांची शहर की सफाई पर नगर निगम हरेक माह करीब छह करोड़ रुपए खर्च करता है। शहर की सफाई और स्वच्छ पर्यावरण के नाम पर 50 करोड़ रुपए से अधिक खर्च करके विभिन्न मशीनों की खरीदारी की गई है। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट लागू कर दिया गया है। इसके बावजूद शहर से नियमित रूप से कूड़े का उठाव नहीं हो रहा। ससर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार रांची में मात्र 58% घरों से ही कूड़े का उठाव हो रहा है। जल-मल निकासी के लिए सीवरेज-ड्रेनेज सिस्टम का अभाव है आैर 40% पब्लिक टॉयलेट भी साफ नहीं होते हैं। सफाई व्यवस्था में सुधार लाने के लिए पिछले 24 वर्षों से प्रयास हो रहे हैं,लेकिन परिणाम बेहतर नहीं निकल रहे हैं। दैनिक भास्कर ने रांची की खराब रैंकिंग पर नगर निगम के सीईओ रहे डॉ. सुनील सिंह से बात की तो उन्होंने इसकी तीन वजहें कागजी प्लान, जीरो इंप्लीमेंट और दिखावे की मॉनिटरिंग को बताया। ये काम हुए फिर भी सुधार नहीं शहर के मात्र 9 वार्ड में सीवरेज-ड्रेनेज प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। पिछले एक दशक में मात्र 80 प्रतिशत काम हुआ है। सभी घर सीवर लाइन से नहीं जुड़े हैं। इस पर करीब 300 करोड़ खर्च हो गए फिर भी लोगों को फायदा नहीं मिला। शेष बचे 44 वार्डों में सीवरेज-ड्रेनेज का अभी तक डीपीआर ही बना है। काम कब तक शुरू होगा इसका पता नहीं है। 1. अव्यवहारिक प्लान : नगर निगम में अब बड़े-बड़े कागजी प्लान बनते हैं। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट लागू करने का प्लान 13 वर्षों से बन रहा है, लेकिन आज तक पूरी तरह धरातल पर नहीं उतरा। क्योंकि, जो प्लान बनते हैं वह व्यवहारिक नहीं होते। कंसल्टेंट प्लान बनाकर देते हैं आैर अफसर उसकी व्यवहारिकता समझे बिना लागू कर देते हैं। इसी का नतीजा है कि साफ-सफाई नहीं दिखती। घरों से नियमित कूड़ा नहीं उठता फिर भी निगम के अधिकारी गीला-सूखा कूड़ा अलग नहीं देने वाले घरों से कूड़ा नहीं उठाने की धमकी देते हैं। यह उचित नहीं है। ऐसी मशीन लगानी चाहिए थी जो कचरा अलग-अलग कर दे। घरों से कूड़ा उठाने के लिए स्वच्छता कॉर्पोरेशन, गीला-सूखा अलग करने के लिए अलग कंपनी, कूड़ा ट्रांसपोर्टिंग के लिए जोंटा नामक कंपनी को ठेका दिया गया है। जबकि, झिरी में गीला कचरा के प्रोसेस के लिए गेल इंडिया ने 150 टन क्षमता का प्लांट लगाया है,लेकिन रोजाना मात्र 60 टन कचरा ही जा रहा है। बायोरेमेडिएशन तकनीक से कूड़ा की प्रोसेसिंग करनी है, पर इसकी रफ्तार काफी धीमी है। 3. साफ-सफाई की देखरेख नहीं : साफ-सफाई की मॉनिटरिंग भी दिखावे की है। अफसर फोटो खींचवाने के लिए ही फिल्ड में निकलते हैं। कोई ऐसा कंट्रोल सिस्टम नहीं है जहां बैठकर पूरे शहर की सफाई की मॉनिटरिंग हो सके। इंदौर में कंट्रोल रूम से ही एक-एक कूड़ा वाहन की स्थिति, उठाएं गए कूड़ा का आकलन और डिस्पोजल की निगरानी होती है। स्वच्छता के लिए एक समर्पित टीम होती है जिसपर सफाई की प्लानिंग, इंप्लीमेंट करने आैर निगरानी करने की जवाबदेही होती है। शिकायतों का निपटारा करके उसका फीडबैक भी लेती है। इससे सफाई के साथ अन्य प्लान की वास्तविकता का पता चलता है। डॉ. सुनील सिंह 2. कूड़ा वाहन और कर्मचारी पर्याप्त नहीं: रांची शहर की आबादी 15 लाख से अधिक है। लेकिन 10 बजे के बाद या रात में शहर में कूड़ा वाहन नहीं दिखेंगे। शहर की संकरी गलियों, वीआईपी रोड, हाट-बाजारों की सफाई की प्लानिंग हो जाती है,लेकिन उसे लागू नहीं किया जाता। जरुरत के अनुसार 70 प्रतिशत वाहन भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में बीट के अनुसार पर्याप्त कर्मचारी भी नहीं है। एक दशक से सीवरेज-ड्रेनेज सिस्टम पर काम चल रहा है,लेकिन आज तक लागू नहीं हुआ। खुली नालियां बजबजाती रहती है। बरसात में आेवरफ्लो होकर सड़कों पर गंदा पानी बहता है। इसे व्यवस्थित किए बिना रैंकिंग नहीं सुधरेगी। शहर में करोड़ों खर्च करके 200 से अधिक मॉड्यूलर और सार्वजनिक शौचालय का निर्माण कराया गया है। लेकिन इसकी सफाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है। शौचालय की सफाई नियमित रूप से नहीं होती है और न पानी व अन्य व्यवस्था है। ऐसे में हाट-बाजार में अभी भी लोग खुले में मूत्र त्याग करते हैं। इस पर सख्ती नहीं होने से स्वच्छता की रैंकिंग खराब हो रही है।


