भास्कर रिसर्च रिपोर्ट | थोड़ी सी बारिश में शहर डूब क्यों जाता है? IIT खड़गपुर की टीम कर रही सर्वे, रिपोर्ट में खुलासा थोड़ी सी बारिश में शहर डूब क्षेत्र बन जाता है। आखिर क्यों? यही जानने के लिए यूआईटी की और से आईआईटी खड़गपुर की टीम के शहर में सर्वे कराया जा रहा है। अभी तक की स्टडी में सामने आया है कि प्राकृतिक नाले बाधित हो गए है। जूनावास क्षेत्र से सांगानेर रोड और पांडू नाले के बहाव में कई निर्माण हो गए। वहीं, सांगानेर और गुवारड़ी नाले का बहाव फिलहाल प्रभावित नहीं हुआ है। प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, पुराना भीलवाड़ा, जूनावास, सूचना केंद्र और भोपालगंज क्षेत्र व कलेक्ट्रेट का पानी अंतिम रूप से सांगानेर रोड के रास्ते कोठारी नदी में जाता है। शहर का लगभग 26.96 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का पानी इसी मार्ग से एकत्र होकर नाले में शामिल होता है। शहर का यह सबसे पुराना विकसित क्षेत्र है, जहां समय के साथ बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य, सड़क विकास और अतिक्रमण हुए हैं। इन गतिविधियों के कारण प्राकृतिक जल बहाव के मार्ग प्रभावित हुए और नालों की जल सहन करने की क्षमता कम हो गई। तेज बारिश में यही वजह है कि शहर के कई हिस्सों में पानी भर जाता है। शहर के सभी 70 वार्डों में बनाए जाएंगे बेंचमार्क, उसी के अनुसार नाले बनेंगे, सड़कों की ढलान होगी नगरीय विकास विभाग ने यूआईटी के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए शहर का मास्टर ड्रेनेज प्लान बनाने के लिए 2.44 करोड़ रुपए की मंजूरी दी। यूआईटी ने यह प्रस्ताव गत 18 सितंबर को यूआईटी ट्रस्ट मीटिंग में अनुमोदन करके विभाग को भेजा था। शहर में जलभराव की समस्या से निपटने के लिए डीजीपीएस सर्वे और ड्रोन सर्वे के बाद शहर के सभी 70 वार्डों में प्रमुख सरकारी भवनों में बैंचमार्क स्थापित किए जाएंगे। अधिकारियों के अनुसार, इन बेंचमार्क का उद्देश्य भविष्य में किसी भी वार्ड में नाला या नाली निर्माण होने पर उसके ढलान और ऊंचाई का सटीक निर्धारण करना होगा। बेंचमार्क के माध्यम से नाले और नालियों का निर्माण मानक के अनुसार होगा, जिससे जल निकासी बेहतर होगी और जलभराव की समस्या कम होगी। ठोस समाधान }जल बहाव की दृष्टि से शहर चार भागों में विभाजित, 3 क्षेत्रों में पानी भरने की समस्या आईआईटी की टीम ने शहर के जल निकास (ड्रेनेज) को चार भागों में विभाजित किया है। सांगानेर रोड, पांडू का नाला, सांगानेर और गुवारड़ी नाला। शहर का पानी इन चार माध्यमों से होकर नदियों में शामिल होता है। इसमें सांगानेरी गेट, पांडू का नाला और सांगानेर नाला कोठारी नदी में, जबकि गुवारड़ी नाले का पानी बनास नदी में जाता है। टीम के नेतृत्व में प्रो. एके गुप्ता ने बताया कि पूरा ड्रेनेज प्लान तैयार होने के बाद ही शहर में जलभराव की समस्या का ठोस समाधान निकाला जा सकेगा। }गुवारड़ी जलग्रहण क्षेत्र चारों में सबसे बड़ा इसके विपरीत, गुवारड़ी जलग्रहण क्षेत्र चारों में सबसे बड़ा है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 48.05 वर्ग किलोमीटर है। यह गुवारड़ी नाले के माध्यम से सीधे बनास नदी में जल प्रवाहित करता है। इस क्षेत्र में प्राकृतिक ड्रेनेज संरचना काफी हद तक सुरक्षित है। बड़े पैमाने पर जल प्रवाह मार्गों में परिवर्तन न होने के कारण यहां वर्षा जल का बहाव सुचारू रहता है, जिससे बाढ़ की संभावना कम होती है। }सांगानेर का प्राकृतिक बहाव सुरक्षित इसी प्रकार, सांगानेर क्षेत्र लगभग 22.38 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। कोठारी नदी में पानी जा रहा है। यह क्षेत्र के प्राकृतिक स्वरूप में बदलाव नहीं हुआ। गुवारड़ी नाला व सांगानेर दोनों क्षेत्रों में प्राकृतिक जल प्रवाह के रास्ते सुरक्षित रहने के कारण निचली नदियों के साथ बेहतर हाइड्रोलॉजिकल संपर्क बना रहता है। आगे } 50 साल की बारिश के आंकड़ों से देखेंगे कहां सबसे ज्यादा जलभराव शहर में जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान निकालने के लिए यूआईटी ने मौसम विभाग से आंकड़े लेने का निर्णय लिया है। शहर में पिछले 40 से 50 सालों में हुई बरसात, बारिश की गति, विभिन्न क्षेत्रों में हुई वर्षा का विवरण और अन्य संबंधित आंकड़े जुटाए जाएंगे। इन आंकड़ों के आधार पर शहर के जल निकासी ढांचे, नालों और तालाबों की क्षमता का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा। इससे यह पता चलेगा कि किन क्षेत्रों में अधिक जलभराव होता है और कौन से स्थानों पर सुधार की तत्काल आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने रिकॉर्ड और क्षेत्रवार आंकड़ों के अध्ययन से न केवल मौजूदा समस्याओं का समाधान मिलेगा, बल्कि भविष्य में आने वाली भारी बारिश और बाढ़ जैसी घटनाओं से निपटने की बेहतर तैयारी भी की जा सकेगी। }सुभाषनगर जल क्षेत्र 28.25 वर्ग किलोमीटर में सुभाषनगर जलग्रहण क्षेत्र लगभग 28.25 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। पांडू के नाले के माध्यम से कोठारी नदी में जा रहा है। इस क्षेत्र में भी तेजी से शहर का विस्तार होने से कई स्थानों पर नालों में बदलाव, कल्वर्ट निर्माण तथा आंशिक अवरोध की स्थिति उत्पन्न हुई है। दोनों क्षेत्रों में प्राकृतिक ड्रेनेज व्यवस्था में हुए बदलावों से बरसात के पानी बहाव प्रभावित हुआ। जिससे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में बाढ़ का जोखिम बढ़ गया।


