हमारी निशुल्क दवा योजना से‎ आई देश में स्वास्थ्य क्रांति‎:मरीज की जेब से बोझ हुआ कम‎, राजस्थान में‎ यूनिवर्सल हेल्थ केयर’ की सफलता का ‎सबसे बड़ा सबूत

‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎हाल ही में मैंने प्रसिद्ध शिक्षक डॉ. विकास ‎दिव्यकीर्ति का एक वीडियो देखा, वे एक गरीब ‎परिवार की आप बीती साझा कर रहे थे। एक 30‎ वर्षीय युवक को कैंसर हो गया, वह 6 महीने और‎ जी सकता था, लेकिन इलाज बहुत महंगा था।‎ परिवार एक कठोर और दिल दहलाने वाला निर्णय‎लेता है – इलाज न करवाने का। उनका तर्क था,‎‘अगर हम इलाज करवाते हैं, तो कर्ज के बोझ तले‎ पूरा परिवार “मर” जाएगा, इसलिए हमने उसे ही‎ मरने दिया।’‎ यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि उस आर्थिक ‎क्रूरता का दस्तावेज हैं, जिससे भारत का गरीब और‎मध्यम वर्ग जूझ रहा है। इसके लिए मैंने मुख्यमंत्री‎ बनने के पहले दिन से काम शुरू किया। ‎1998 में‎ जब मैं पहली बार मुख्यमंत्री बना, तो संकल्प लिया ‎कि राजस्थान में कोई भी व्यक्ति पैसे के अभाव में ‎‎इलाज से वंचित न रहे। उस समय बीपीएल परिवारों‎ के लिए ‘मुख्यमंत्री बीपीएल जीवन रक्षा कोष’ शुरू ‎‎किया। 2003 में सरकार बदलने से यह विजन रुक ‎‎गया। 2008 में फिर से इस योजना का दायरा‎बढ़ाया। इसमें बीपीएल, वृद्धजन, दिव्यांग, विधवा‎और 11 श्रेणियों के जरूरतमंदों का सरकारी‎अस्पतालों में इलाज निशुल्क किया।‎ 2011 में ‘मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना’ और‎ 2013 में ‘निशुल्क जांच योजना’ शुरू की। ‎डब्ल्यूएचओ ने भी इस मॉडल को सराहा। 2018 में‎हमने स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। 2020 में ‎राजस्थान में शानदार कोविड मैनेजमेंट हुआ, ‎भीलवाड़ा मॉडल की चर्चा देश-दुनिया में हुई। इसी‎ दौरान यूनिवर्सल हेल्थ केयर के लिए सरकारी व‎ निजी दोनों क्षेत्रों में काम शुरू किया। तब सरकारी‎ अस्पतालों में इलाज को “कैशलेस” नहीं, बल्कि पूरी ‎तरह “बिल-मुक्त” कर दिया।” “मुख्यमंत्री निशुल्क‎निरोगी राजस्थान योजना” के तहत ओपीडी व‎आईपीडी सेवाएं पूरी तरह फ्री की गईं। निजी ‎अस्पतालों के दरवाजे भी गरीबों के लिए खोले।‎ चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना में 25 लाख रु तक‎ का बीमा कवर दिया। जिसमें कैंसर तक के इलाज की‎ सुविधा है। सरकारी कर्मचारियों के लिए‎आरजीएचएस योजना लाई गई।‎ कई एजेंसियों के सर्वे के अनुसार भारत में महंगे ‎इलाज के कारण हर साल करीब 3.9 करोड़ लोग ‎गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं और परिवार अपनी‎ सालाना आय का 20% हिस्सा चिकित्सा पर खर्च ‎करते हैं। लगातार सुधारों के चलते 50 लाख से‎ अधिक लोगों ने चिरंजीवी में अस्पताल में भर्ती‎ होकर अपना मुफ्त इलाज करवाया। ये वो 50 लाख ‎परिवार हैं, जो शायद इलाज के खर्च से कर्ज में डूब‎ जाते या उस “बेबसी” का शिकार होते जिसका जिक्र‎ विकास दिव्यकीर्ति ने किया।‎ 2018-19 में राजस्थान में कुल स्वास्थ्य खर्च का‎ लगभग 44.9% हिस्सा मरीज को अपनी जेब से‎ देना पड़ता था। 2021-22 में यह घटकर 37.1%‎ रह गया। 2018 से 2023 के बीच राज्य में एक नई‎ मेडिकल यूनिवर्सिटी व कुल 30 जिलों में मेडिकल‎ कॉलेज स्वीकृत या शुरू किए। आईपीडी टावर जैसा‎ विश्वस्तरीय प्रोजेक्ट शुरू किया, इंस्टीट्यूट ऑफ‎कार्डियोलॉजी, इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज और‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎वायरोलॉजी लैब की स्थापना की ताकि गंभीर रोगों के‎लिए लोगों को दिल्ली-मुंबई न भागना पड़े।‎ चिरंजीवी बीमा योजना सरकारी व निजी दोनों‎ अस्पतालों में लागू थी, जिसका फायदा सरकारी‎ अस्पतालों को आर्थिक लाभ के रूप में भी मिला।‎ सरकारी अस्पतालों ने इस योजना के माध्यम से‎बीमा कंपनियों से क्लेम लेना शुरू किया, जिससे ‎उनकी आर्थिक सेहत बेहतर हो गई। वर्ष 1999 में‎ प्रदेश का स्वास्थ्य बजट महज 600 करोड़ रुपए‎(अनुमानित) के आसपास था, जो 2023 में‎बढ़कर 20,000 करोड़ रुपए से अधिक हो गया।‎ इन सभी कामों को एक साथ संस्थागत रूप देने के‎लिए हम “राइट टू हेल्थ” कानून लाए, ताकि इलाज‎कानूनी अधिकार बने। दुर्भाग्यवश वर्तमान सरकार ने‎इस कानून को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। केन्द्र ‎सरकार को भी आयुष्मान भारत योजना का दायरा ‎बढ़ाकर इसे सभी के लिए लागू करना चाहिए। राजस्थान ‎में 100 में से 88 परिवारों के‎पास स्वास्थ्य सुरक्षा है, यूपी-बिहार में‎यह संख्या 15-20 है, वहीं राष्ट्रीय औसत‎भी 41 परिवारों का है। यह राजस्थान में‎ “यूनिवर्सल हेल्थ केयर” की सफलता का‎ सबसे बड़ा सबूत है।‎

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