हम तभी खुश रह सकते हैं जब अपने दिल की न सुनें : स्वामी चिद्रारुपानंद

भास्कर न्यूज | अमृतसर रणजीत एवेन्यू चिन्मय अमृत आश्रम में सोमवार को प्रभावशाली टाक की। पूज्य स्वामी चिद्रारुपानंद के मुखारविंद से टाक को सुनने कई लोग पहुंचे। स्वामी जी ने तीन बार ओम के उच्चारण के साथ टाक शुरू किया। उन्होंने कहा कि हमारा चित प्रसन्न तो सारी दुनिया प्रसन्न है। प्रसन्नता का मतलब है कि दिल की नहीं सुनना। हम तभी प्रसन्न हो सकते हैं जब हम अपने दिल की न सुने। क्योंकि हमारा शरीर नहीं देख सकता। सबसे पहले हमारी आंखें किसी चीज तो देखती हैं और हमारा दिल में उसके भाव आते हैं। अब सवाल उठता है कि चित को प्रसन्न कैसे रखे? हमारा शरीर, इंद्रियां और मन ठीक है तो आदमी अपनी साधना ठीक से कर सकता है। हठ योग में हमें दिल की न सुनकर हठ करना है। इससे भी हम प्रसन्न रह सकते हैं। हमारे सामने पड़ी चीज को हमारी आंखें देखती हैं और दिमाग उसे पढ़ता है। दिल उसका चित्र बनाकर अनेक प्रश्न पैदा कर देता है तो हमारी प्रसन्नता समाप्त हो जाती है। इसलिए दिल की कभी न सुने। उदाहरण के तौर पर हमारे सामने कटोरी और गिलास पड़ा होता है। जिसे आंखों ने देखा और दिल ने उसके अलग-अलग चित्र बना दिए जो वास्तव में नहीं है। जब दिल के सारे चित्र खत्म हो जाते है तो उसका परिणाम यह होता कि हमारा जीवन अपने स्वरूप में आ जाता है। हमारा मन चंचल अवस्था में होता है तो उसके अंदर कई सवाल पैदा होते रहते है? अगर हम अपनी आंखें बंद भी कर लेते हैं तो भी हमारा मन आकृतियां बनाता रहता है। आंखों ने एक आदमी और पहाड़ को देखा, तो मन उनके बारे में सोचना शुरू कर देता कि वह व्यक्ति कैसा होगा, पहाड़ कैसे बना और फिर उसके आगे की कल्पना करता रहता है। अगर हमें अपने मन को नियंत्रण कर लेते है तो आप हर समय प्रसन्न रहें। इस टाक में चिन्मय मिशन के अध्यक्ष अविनाश महिंद्रू, अनिल सिंघल समेत कई लोग मौजूद रहे।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *