हर शुक्रवार एक पंचायत या गांव की कहानी, आज पढ़िए बापडुंदा गांव के बारे में

भास्कर न्यूज | पचेवर बापडुंदा के लोग गांव की स्थापना के समय यहां के शासक को बापजी के नाम से संबोधित करते थे। इससे गांव का नाम बापडुंदा पड़ गया, जो परिसीमन से पूर्व बरोल ग्राम पंचायत का हिस्सा था। सन 2025 में कराए गए ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन के तहत बापडुंदा तथा सांस गांव को मिलाकर ग्राम पंचायत का गठन किया है। ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन के बाद अब इसे गांव ग्राम पंचायत का दर्जा िमल गया है। ग्रामीणों ने बताया कि गांव की स्थापना पंवार वंशी राजपूतों ने करीब 5 सौ साल पूर्व की थी। गांव की स्थापना के दौरान गांव के शासक को बापजी के नाम से संबोधित किया जाता था, जिससे गांव का नाम बापडुंदा पड़ गया। शासकों द्वारा यहां गढ़ का निर्माण भी कराया गया था। इसके आज भी अवशेष मिलते हैं तथा उस स्थान को गढ़ के नाम से संबोधित किया जाता है। पंवार वंश के बाद यहां क्रमश: गौड़ वंश तथा 1605 ई. में खंगारोत वंश के देवसिंह ने शासन किया। सन 1820 में अजमेर से राठौड़ वंशी राजपूत भी आए। कहा जाता है कि देवी सिंह की बहन चंदन कंवर ने गांव में तालाब को खुदवाने के साथ ही पक्की चार दीवारी भी बनवाई थी। जो गांव में आने वाले को आकर्षित करती है। चंदन कंवर ने गांव में एक मंदिर का निर्माण भी कराया था, जिसमें चारभुजा जी की प्रतिमा स्थापित है। इसीलिए मंदिर को चारभुजा मंदिर के नाम से जाना गया। कालांतर में इस मंदिर को चंदन कंवर ने ग्रामीणों के सुपुर्द कर दिया। आज इस मंदिर को पंचायती चारभुजा मंदिर के नाम से जाना जाता है। ग्रामीणों ने बताया कि वैसे तो गांव में माली, जाट, राजपूत, ब्राह्मण, बलाई ,खाती, गोस्वामी आदि जाति के लोग निवास करते हैं। सन 1954 में गांव में प्राथमिक स्कूल की स्थापना हुई। सन 2005 में स्कूल को उच्च प्राथमिक स्तर पर क्रमोन्नत किया। उच्च शिक्षा के लिए बच्चे अपने पूर्व पंचायत मुख्यालय बरोल आते हैं। अब ग्रामीणों को सरकार की हर ग्राम पंचायत पर सीनियर सेकंडरी स्कूल की योजना का लाभ मिलने की उम्मीद जगी है। कुछ वर्ष पूर्व गांव को स्टेट हाईवे 37 ए दूदू-छाण से वाया बरोल होते हुए जोड़ने वाली पक्की सड़क की सौगात तो मिल गई, परन्तु न तो गांव में रोडवेज बस की सुविधा मिली और न ही उप स्वास्थ्य केन्द्र की सौगात।

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