सरकारी सेवा में ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ के नाम पर मनमानी करने वाले अधिकारियों को राजस्थान हाईकोर्ट ने झटका दिया है। जोधपुर रेंज के आईजी द्वारा एक पुलिस इंस्पेक्टर को ‘नाकारा’ और ‘जनहित में अनुपयोगी’ बताकर जबरन रिटायर करने के आदेश को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। जस्टिस फरजंद अली ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि जिस कर्मचारी ने अपनी 24 साल की नौकरी में 34 इनाम जीते हों और पिछले 7 सालों से जिसका रिकॉर्ड ‘आउटस्टैंडिंग’ रहा हो, उसे केवल 10-12 साल पुरानी छोटी-मोटी सजाओं के आधार पर घर नहीं भेजा जा सकता। कोर्ट ने पुलिस विभाग को निर्देश दिया है कि इंस्पेक्टर को तुरंत सेवा में बहाल किया जाए और उसे जबरन रिटायरमेंट की तारीख 9 जुलाई 2020 से सभी ‘नोशनल लाभ’ दिए जाएं। जानें… क्या है पूरा मामला? जोधपुर के पावटा बी रोड लक्ष्मी नगर निवासी याचिकाकर्ता अरविंद चारण (47) ने 19 अगस्त 1996 को राजस्थान पुलिस में बतौर सब-इंस्पेक्टर नौकरी शुरू की। अच्छे रिकॉर्ड के चलते उन्हें 20 फरवरी 2009 को पदोन्नति (इंस्पेक्टर) मिली। जैसलमेर जिले में वे अपनी ड्यूटी अच्छे से कर रहे थे। लेकिन अचानक 9 जुलाई 2020 को जोधपुर रेंज आईजी ने एक आदेश जारी कर उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी। आदेश में राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम का हवाला देते हुए कहा गया कि उनका सेवा रिकॉर्ड ‘असंतोषजनक’ है और वे ‘जनहित’ में सेवा जारी रखने योग्य नहीं हैं। इस आदेश के खिलाफ अरविंद चारण ने साल 2020 में ही हाईकोर्ट की शरण ली थी, जिस पर अब करीब 5 साल बाद फैसला आया है। दलील: ‘सर्वोत्तम सेवा चिह्न’ पाने वाला ‘नाकारा’ कैसे? कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने विभाग की कार्रवाई को पूरी तरह अवैध और द्वेषपूर्ण बताया। वकील ने तर्क दिया कि अरविंद चारण का पूरा सेवा रिकॉर्ड बेदाग रहा है। अपनी 24 साल की नौकरी में उन्हें 34 बार प्रशंसा पत्र और नकद पुरस्कार मिले हैं। यहां तक कि उन्हें पुलिस विभाग का प्रतिष्ठित “सर्वोत्तम सेवा चिह्न” भी मिल चुका है। वकील ने कोर्ट को बताया कि पिछले 7 से 10 वर्षों की वार्षिक कार्य मूल्यांकन रिपोर्ट में उन्हें लगातार “बहुत अच्छा” और “आउटस्टैंडिंग” ग्रेड मिली है। उनके पूरे करियर में केवल तीन बार (वर्ष 2008, 2009 और 2012 में) ‘परिनिंदा’ की छोटी सजाएं मिली थीं, जो कि माइनर पेनाल्टी में आती हैं। पुलिस विभाग ने कार्मिक विभाग के 21 अप्रैल 2000 के सर्कुलर की अनदेखी की है, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का फैसला लेते समय पिछले 5-7 साल के रिकॉर्ड को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकार का पक्ष: ‘सब्जेक्टिव सेटिस्फेक्शन’ जरूरी दूसरी तरफ, सरकार की ओर से एएजी ने कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति कोई ‘सजा’ नहीं है, बल्कि यह प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त रखने की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि सक्षम अधिकारी ने पूरे सेवा रिकॉर्ड को देखने के बाद अपने ‘व्यक्तिगत संतोष’ के आधार पर यह फैसला लिया था, जिसमें पुराने रिकॉर्ड में मिली सजाएं भी शामिल थीं। कोर्ट का विश्लेषण: ‘डेड वुड’ की छंटाई के नाम पर मनमानी नहीं जस्टिस फरजंद अली ने दोनों पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि स्क्रीनिंग कमेटी ने यांत्रिक तरीके से काम किया है। कोर्ट ने माना कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का उद्देश्य डेड वुड यानी निकम्मे कर्मचारियों को हटाना है, लेकिन इसका इस्तेमाल अच्छे कर्मचारियों को परेशान करने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अपने आदेश में निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं: पुराने गड़े मुर्दे न उखाड़ें: “विभाग ने वर्ष 2020 में फैसला लेते समय 2008, 2009 और 2012 की पुरानी और मामूली सजाओं को आधार बनाया, जो कि कानूनन गलत है। जब कर्मचारी का पिछले 7 साल का रिकॉर्ड ‘आउटस्टैंडिंग’ है, तो पुरानी सजाएं अपना महत्व खो देती हैं।” गाइडलाइंस का उल्लंघन: “कार्मिक विभाग का सर्कुलर स्पष्ट कहता है कि स्क्रीनिंग कमेटी को पिछले 5-7 वर्षों के रिकॉर्ड पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अगर हालिया सेवा रिकॉर्ड अच्छा है, तो पुरानी नेगेटिव एंट्रीज के आधार पर किसी को समय से पहले रिटायर नहीं किया जा सकता।” तर्कहीन फैसला: “याचिकाकर्ता को वर्ष 2014 में ही सेलेक्शन स्केल (पदोन्नति समान लाभ) दिया गया था। इसका मतलब है कि तब तक उसका रिकॉर्ड अच्छा माना गया। तो फिर अचानक 2020 में, बिना किसी नई बड़ी गलती के, वह ‘अक्षम’ या ‘अवांछित’ कैसे हो गया? यह फैसला मनमाना और विवेकशून्य है।” जनहित नहीं: “रिकॉर्ड देखने से साफ है कि याचिकाकर्ता ने न तो कोई सत्यनिष्ठा से समझौता किया और न ही वह अक्षम था। ऐसे में उसे हटाना जनहित में नहीं माना जा सकता।” कोर्ट ने माना कि जोधपुर रेंज आईजी का आदेश कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरता। कोर्ट ने आईजी द्वारा 9 जुलाई 2020 को जारी अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता अरविंद चारण को तुरंत प्रभाव से सेवा में बहाल किया जाए। याचिकाकर्ता को जबरन रिटायरमेंट की तारीख से लेकर बहाली तक के सभी ‘नोशनल लाभ’ मिलेंगे। यानी, इस अवधि को उनकी नौकरी का हिस्सा माना जाएगा, उनकी वरिष्ठता बनी रहेगी और वेतन निर्धारण में भी इसका लाभ मिलेगा, हालांकि इस अवधि का नकद वेतन (एरिअर) नहीं मिलेगा।


