राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने जजमेंट में आयकर विभाग के केस ट्रांसफर ऑर्डर को दूसरी बार रद्द कर दिया है। चीफ जस्टिस के.आर. श्रीराम और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने उदयपुर की कंपनी मुरलीवाला एग्रोटेक प्राइवेट लिमिटेड के मामले में यह फैसला दिया है। यह ऑर्डर आयकर विभाग द्वारा 19 अक्टूबर 2022 को जारी किया गया था। जिसे राजस्थान हाईकोर्ट ने अवैध मानते हुए रद्द कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने विभाग के रवैये को ‘अड़ियल व मनमाना’ करार देते हुए कहा कि ‘टैक्सपेयर को शटलकॉक बनाया’ जा रहा है। दरअसल, कंपनी के निदेशक राकेश गुप्ता ने याचिका दायर कर आयकर अधिनियम 1961 की धारा 127 के तहत ट्रांसफर ऑर्डर को चुनौती दी थी। क्या है मामला दरअसल, 27 नवंबर 2017 को आयकर विभाग की टीम ने उदयपुर के ब्रिंदावन ग्रुप पर कार्रवाई की थी। इसी दौरान उदयपुर की मुरलीवाला एग्रोटेक पर भी छानबीन की गई थी। ब्रिंदावन ग्रुप का असेसमेंट दिल्ली में हुआ। इसलिए मुरलीवाला एग्रोटेक प्राइवेट लिमिटेड का भी असेसमेंट दिल्ली ट्रांसफर कर दिया गया। मामले में आयकर विभाग ने ट्रांसफर ऑर्डर का आधार यह बताया था कि कार्रवाई में शामिल व्यक्तियों-फर्मों के असेसमेंट में एकरूपता के लिए यह जरूरी था। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि ब्रिंदावन ग्रुप का असेसमेंट तो दिसंबर 2019 में ही पूरा हो चुका था, इसलिए याचिकाकर्ता का केस दिल्ली ट्रांसफर करने का कोई कारण नहीं बचता। यह मामला 6 साल से ज्यादा समय से लंबित है। ऐसी स्थिति अनुचित और अन्यायसंगत ट्रांसफर ऑर्डर के कारण है। पहले भी हाईकोर्ट से रद्द हो चुका ऑर्डर यह मामला दूसरी बार अदालत में पहुंचा है। इससे पहले भी कंपनी ने विभाग द्वारा 21 नवंबर 2019 को जारी आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती थी। उसकी सुनवाई करते हुए कोर्ट की को-ऑर्डिनेट बेंच ने 20 जुलाई 2022 को 21 नवंबर के ऑर्डर को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया था। उस वक्त कोर्ट ने आयकर विभाग को निर्देश दिया था कि यदि विभाग फिर से केस ट्रांसफर करना चाहता है तो पहले याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर देना होगा। इसके बाद विभाग ने 5 सितंबर 2022 को नोटिस देकर सुनवाई का अवसर दिया। कंपनी ने अपनी विस्तृत आपत्तियां दर्ज कराईं थीं, लेकिन प्रधान आयुक्त आयकर ने पुराने आधार पर ही 19 अक्टूबर 2022 को दोबारा ट्रांसफर ऑर्डर जारी कर दिया। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हनन कोर्ट ने अपने पहले के फैसले में स्पष्ट रूप से कहा था कि आयकर अधिनियम की धारा 127(1) का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन है, जो किसी भी विरोधी प्रकृति की कार्रवाई के लिए मौलिक है। जब भी किसी करदाता का केस एक असेसिंग ऑफिसर (AO) से दूसरे में ट्रांसफर करने का प्रस्ताव हो तो टैक्सपेयर को सुनवाई का मौका देना जरूरी है। कोर्ट ने पाया- इस मामले में आयकर विभाग के अधिकारियों ने न तो यह साबित किया कि करदाता को सुनवाई का अवसर देना संभव नहीं था और न ही ऐसे कारण दर्ज किए, जिनके आधार पर केस को उदयपुर सर्कल से नई दिल्ली सर्कल में ट्रांसफर करने का निर्णय लिया गया था। ‘ऑर्डर न तो उचित, न ही न्यायसंगत, बल्कि मनमाना है…’ अब जस्टिस चिरानिया ने जजमेंट में आयकर विभाग के आचरण की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि विभाग अपने पहले के निर्णय पर अड़ा रहा और करदाता को ‘शटलकॉक’ बनाने का काम कर रहा है। जबकि आयकर विभाग में फेसलेस सिस्टम लागू है, जिससे टैक्सेशन के मामलों में अधिक पारदर्शिता (Transparency) आई है, तो 19 अक्टूबर 2022 का ट्रांसफर ऑर्डर का कार्य न तो उचित है और न ही न्यायसंगत, बल्कि मनमाना है। कोर्ट का फैसला- ऑर्डर रद्द, विभाग के अधिकार भी सुरक्षित हाईकोर्ट ने आयकर विभाग के 19 अक्टूबर 2022 के ट्रांसफर ऑर्डर को अवैध घोषित करके रद्द कर दिया। निर्देश दिया कि विभाग 21 नवंबर 2019 और 19 अक्टूबर 2022 के ट्रांसफर ऑर्डर से पहले की स्थिति से कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र है। याचिका के विचाराधीन रहने के दौरान याचिकाकर्ता के खिलाफ पारित कोई भी प्रतिकूल आदेश भी अवैध घोषित किया गया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आयकर विभाग के सभी अधिकार और दावे सुरक्षित रखे गए हैं, जिसमें आयकर अधिनियम 1961 की धारा 153सी या अन्य लागू प्रावधानों के तहत कानून के अनुसार कदम उठाना शामिल है। हालांकि, यह स्वतंत्रता याचिकाकर्ता के खिलाफ ऐसी कार्रवाई के लिए कोर्ट की स्वीकृति के रूप में नहीं समझी जानी चाहिए।


