झारखंड में पथ निर्माण विभाग में अधिकारियों का टोटा पड़ गया है। पथ निर्माण विभाग में पिछले 9 वर्षों से सहायक अभियंता नियुक्ति नियमावली लटकी हुई है। नियमावली नहीं बनने से पथ निर्माण विभाग में 393 अभियंताओं के पद रिक्त पड़े हैं। इसमें अभियंता प्रमुख के 4 पद, मुख्य अभियंता के 14 में 11 पद, अधीक्षण अभियंता के 51 में 22 पद, कार्यपालक अभियंता के 264 में 143 पद और सहायक अभियंता के 213 पद रिक्त हैं। इन पदों पर प्रमोशन नहीं होने की वजह से इसका सीधा असर निर्माण कार्य पर पड़ रहा है। नई योजना बनाने से लेकर उसकी मॉनिटरिंग प्रभारी व्यवस्था के तहत चल रही है। इसके बावजूद पथ निर्माण विभाग अभी तक नियुक्ति नियमावली को अंतिम रूप देने में पीछे है। विभाग के इस रवैये पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है। हाईकोर्ट के जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस गौतम कुमार चौधरी की अदालत ने पिछले दिनों मामले की सुनवाई करते हुए अधिकारियों की जिम्मेदारी और दूरदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए नाराजगी जताई है। अदालत ने 9 वर्षों से नियुक्ति नियमावली को कैबिनेट से स्वीकृत नहीं कराने पर पथ निर्माण और कार्मिक विभाग के सचिव को अवमानना का नोटिस जारी किया है। 22 जनवरी को दोनों अफसरों पर अवमानना की कार्रवाई को लेकर सुनवाई होगी। वह सबकुछ जो आपके लिए जानना जरूरी है नियमावली को कार्मिक-जेपीएससी से स्वीकृति नहीं सहायक अभियंता नियुक्ति नियमावली पर पथ निर्माण विभाग की ओर से अदालत में हलफनामा दाखिल किया गया है। इसमें इस बात का उल्लेख है कि नियुक्ति नियमावली पर विधि और वित्त विभाग से सहमति मिल गई है, लेकिन कार्मिक विभाग और जेपीएससी से अभी तक स्वीकृति नहीं मिली है। जेपीएससी द्वारा नियमावली पर काम किया जा रहा है। लेकिन 22 जनवरी से पहले कैबिनेट से यह स्वीकृत नहीं हुआ तो कार्मिक और पथ निर्माण सचिव की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। कोर्ट ने अधिकारियों की कार्यशैली पर की गंभीर टिप्पणी हाईकोर्ट ने नियुक्ति नियमावली लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि विधि विभाग द्वारा कानूनी परीक्षण के बाद सहमति दी गई और वित्त विभाग ने भी इसे मंजूरी दे दी थी। इसके बावजूद कार्मिक विभाग द्वारा नियुक्ति और प्रोन्नति नियमावली में सहमति देने में जानबूझकर देरी की गई। जबकि, पथ निर्माण विभाग प्रशासी विभाग हैं। उसकी जिम्मेदारी है कि कोर्ट द्वारा तय की गई समय सीमा में नियुक्ति नियमावली को पारित किया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया, यह अदालत के अंतरिम आदेश का उल्लंघन है।


