राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- किसी भी कर्मचारी के सर्विस पीरियड में रविवार और सवेतन छुट्टी (लीव विद पे) को शामिल करते हुए उसके वर्किंग डे की गणना की जाएगी। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट में जस्टिस अनूप ढंड की अदालत ने लालचंद जिंदल की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिकाकर्ता के एडवोकेट सुरेश कश्यप ने बताया- बैंक ऑफ बड़ौदा ने लालचंद जिंदल को अंतिम कार्य वर्ष में सिर्फ 227 दिन की सेवा देने का हवाला देते हुए निकाल दिया था। उन्होंने लेबर कोर्ट में अपील की थी। वहां उनके खिलाफ फैसला आया तो उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 227 दिन वर्किंग डे मान कर नौकरी से निकाला था
एडवोकेट सुरेश कश्यप ने बताया कि याचिकाकर्ता बैंक ऑफ बड़ौदा में दैनिक वेतनभोगी के रूप में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद पर कार्यरत थे। बैंक ने उनके अंतिम कार्य वर्ष में काम के दिनों की गणना 227 दिन की। नियमों के तहत कार्मिक के काम के दिनों की गणना 240 दिन होनी चाहिए। ऐसे में बैंक ने उन्हें नौकरी से हटा दिया। लेबर कोर्ट ने भी 14 नवंबर 2014 को उनकी याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा- लेबर कोर्ट एक साल में फैसला दे
एडवोकेट सुरेश कश्यप ने बताया- हाईकोर्ट ने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता के कार्यों की गणना में रविवार और सवेतन अवकाश को शामिल नहीं किया गया। वहीं, लेबर कोर्ट ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। लेबर कोर्ट का आदेश कानून की नजर में चलने योग्य नहीं है। इसलिए इसे रद्द किया जाता है। साथ ही मामला फिर से लेबर कोर्ट को भेजते हुए उसे दोनों पार्टियों को सुनने के बाद एक साल की अवधि में आदेश पारित करने के लिए कहा है। हाईकोर्ट ने दोनों पार्टियों को लेबर कोर्ट के सामने 17 अप्रैल से पहले उपस्थिति देने के भी निर्देश दिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला भी दिया
अदालत ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25-बी(2) के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने आदेश में निर्धारित किया है कि कर्मचारी की निरंतर सेवा के रूप में रविवार और अन्य सवेतन छुट्टियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।


