हाई कोर्ट का तंज:आप खुशनसीब! MP में रहते हैं, प्रदूषित राज्यों में जाकर देखें

मप्र में पेड़ों के कत्लेआम पर हाई कोर्ट ने सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने कहा कि एनजीटी द्वारा गठित हाई-पॉवर कमेटी की अनुमति के बिना प्रदेश में कोई भी पेड़ नहीं काटा जाए। दरअसल, भोपाल के पास भोजपुर-बैरसिया सड़क निर्माण के लिए बिना अनुमति सैकड़ों पेड़ काटे गए थे। हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू की। बुधवार को इस याचिका का दायरा पूरे प्रदेश तक बढ़ा दिया गया। हाई कोर्ट ने विधानसभा को निर्देश दिया कि एमएलए क्वार्टर्स प्रोजेक्ट में कितने पेड़ काटे गए और कितने काटे जाने हैं। साथ ही इस पूरे प्रोजेक्ट में वृक्षारोपण की क्या योजना है, यह भी बताई जाए। कोर्ट ने सरकार को यह भी कहा कि 2001 के अधिनियम के तहत प्रदेश में वृक्ष अधिकारी नियुक्त किए जाएं। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा- आप खुशनसीब हैं जो मध्य प्रदेश में रहते हैं। पेड़ों की कटाई की अनुमति देने वाले अधिकारी कुछ दिन प्रदूषित प्रदेशों में रहकर देखें, तब उन्हें इसकी अहमियत समझ में आएगी। विकास या विनाश?…अदालत ने यह भी कहा कि भोपाल और अन्य जिलों में सालों पुराने पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ग्रीन कवर का सीधा विनाश है, इसे विकास का नाम नहीं दिया जा सकता। एनजीटी का आदेश: नियमानुसार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा जारी दिशा निर्देशों के तहत राज्य सरकार को पेड़ काटने से जुड़े मामलों के लिए एक कमेटी का गठन करना है। यदि किसी प्रोजेक्ट के लिए पेड़ काटने की जरूरत हो तो उक्त समिति से अनुमति लेना जरूरी है। राज्य द्वारा गठित 9 सदस्यीय समिति या वृक्ष अधिकारी से कोई अनुमति नहीं ली गई है। हाई कोर्ट के निर्देश पर विधानसभा सचिवालय, लोक निर्माण विभाग, रेलवे, वन विभाग के अधिकारी हाजिर हुए थे। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने मामले पर अगली सुनवाई 17 दिसंबर को नियत की है।
हस्तक्षेपकर्ता नितिन सक्सेना की ओर से कोर्ट को दैनिक भास्कर की खबर का हवाला देते हुए बताया गया था कि भोपाल में कुछ रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए 244 और पेड़ काटने की मांग की गई है। शिफ्टिंग की आड़ में पेड़ों को काटने का एक नया तरीका अपनाया गया है। इस पर हाई कोर्ट ने विभिन्न विभागों के 7 अधिकारियों को तलब किया था। हाई कोर्ट का विस्तृत आदेश फिलहाल प्रतीक्षारत है। रिपोर्ट… 19 राज्यों में प्रदूषण मानक से ऊपर देश में वायु प्रदूषण का संकट कहीं अधिक व्यापक हो चुका है। 749 में से 447 जिलों (करीब 60%) की हवा में पीएम 2.5 का सालाना औसत राष्ट्रीय मानक से अधिक है। पीएम 2.5 का राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक 40 माइक्रो ग्राम/ घन मीटर है। 19 राज्यों में प्रदूषण का वार्षिक औसत भी राष्ट्रीय मानक से ज्यादा है। एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि देश का कोई भी जिला या राज्य डब्ल्यूएचओ के 5 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर के मानक पर खरा नहीं। ऊर्जा और स्वच्छ हवा पर काम करने वाले संगठन सीआरईए की उपग्रह आधारित रिपोर्ट में ये जानकारी सामने आई है। दिल्ली, त्रिपुरा, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मेघालय और चंडीगढ़ में मानसून के अलावा हर मौसम में सभी जिले मानक से ज्यादा प्रदूषित रहे। 50 सर्वाधिक प्रदूषित जिले चार राज्यों दिल्ली, असम, हरियाणा और बिहार में ही केंद्रित हैं।
पूर्वोत्तर के राज्यों में भी हालात गंभीर होने लगे
दिल्ली सबसे प्रदूषित रहा। पीएम 2.5 का वार्षिक औसत 101 रहा, जो राष्ट्रीय मानक से ढाई गुना है। सभी उत्तरी राज्यों में औसत पीएम 2.5 राष्ट्रीय मानक से ऊपर रहा। पूर्वोत्तर में हालात खराब होने लगे हैं। पुड्डुचेरी में 25 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर के साथ सबसे कम स्तर दर्ज हुआ।

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