‘हाथी’ पर सरकारी खजाना लुटाने में मायावती को क्लीनचिट:सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की, ​बर्थडे पर छोटे भतीजे को सामने लाईं बसपा सुप्रीमो

यूपी में मायावती के जन्मदिन पर एक खास चेहरा नजर आया। वह कोई और नहीं, बल्कि उनके दूसरे भतीजे इशांत थे। मायावती आगे-आगे और दोनों भतीजे आकाश आनंद और इशांत पीछे-पीछे बसपा ऑफिस पहुंचे। जब तक मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की तब तक दोनों भतीजे कुर्सी के बगल में खड़े रहे। इशांत आकाश के छोटे भाई हैं। माना जा रहा है कि मायावती जल्द ही इशांत को भी राजनीति में लॉन्च कर सकती हैं। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी मायावती को बड़ी राहत देते हुए 15 साल पुरानी एक याचिका पर सुनवाई बंद कर दी। याचिका साल 2009 में वकील रविकांत द्वारा दायर की गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि मायावती ने सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए खर्च कर अपनी और अपनी पार्टी के चुनाव चिह्न हाथी की मूर्तियां बनवाईं। याचिका यूपी में मायावती के मुख्यमंत्री रहने के दौरान दायर की गई थी। जन्मदिन पर मायावती ने राहुल-प्रियंका पर तंज कसा
जन्मदिन पर मायावती ने संघर्षमय जीवन और बसपा मूवमेंट का सफरनामा’ भाग-20 के हिंदी और अंग्रेजी एडिशन को लॉन्च किया। इसके साथ ही उन्होंने भाजपा और कांग्रेस पर जमकर हमला बोला। मायावती ने राहुल-प्रियंका पर तंज कसा। कहा- भाई-बहन नीले कपड़े पहनकर नौटंकी कर रहे हैं। इंडी गठबंधन का कोई भविष्य नहीं है। सत्ता में आना जरूरी है। दलित एकजुट नहीं हुए तो जिंदगी गुलाम बनकर रह जाएगी। कुंभ निमंत्रण पर मायावती ने अखिलेश के बयान का सपोर्ट किया। कहा- कुंभ के बारे में अपनी-अपनी आस्था है, जो आस्था रखता है, वह जा रहा है। इसमें निमंत्रण नहीं दिया जाता है। 1- मेरी योजनाओं की सरकारें नकल कर रहीं
15 जनवरी को मेरा जन्मदिन जनकल्याणकारी दिवस के रूप में मनाया जाता है। मेरे नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में जनकल्याण के कार्यों को जनता के सामने रखा जाता है। मेरी योजनाओं की नकल दूसरी सरकारें भी कर रही हैं। मगर उनकी नीयत साफ नहीं है। इसके चलते जनता को पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा। 2- बाबा साहब का अधूरा मिशन मैं पूरा करूंगी
बाबा साहब और कांशीराम के कारवां को आगे बढ़ाने के लिए बसपा को तन, मन और धन से सहयोग करने की आवश्यकता है। बाबा साहब का अधूरा मिशन मैं पूरा करूंगी। केवल नारों से काम नहीं चलेगा, हर क्षेत्र में ठोस काम करना होगा। बाबा साहब और अन्य महापुरुषों के अधूरे मिशन को पूरा करने के लिए हम पूरी तरह से समर्पित हैं। 3- दलित वोटर्स को तोड़ने के लिए बीजेपी-सपा हथकंडे अपना रही
आज मैं अपना 69वां जन्मदिन मिशन के रूप में मना रही हूं। मैं एक बार फिर आगाह करना चाहती हूं कि बसपा के दलित वोट को तोड़ने के लिए कांग्रेस, बीजेपी और सपा जैसी जातिवादी पार्टियां सभी हथकंडे अपना रही हैं। बाबा साहब और उनके आरक्षण की शक्ति बसपा के माध्यम से ही सशक्त हो सकती है। 4- नीले कपड़े पहनकर छलावा कर रहे राहुल-प्रियंका
मायावती ने राहुल प्रियंका पर तंज कसा। उन्होंने कहा- आरक्षण को कोर्ट-कचहरी की आग में झोंकने का प्रयास हो रहा है। कांग्रेस आरक्षण समाप्त करने की कोशिश कर रही है। उनके नेता नीले कपड़े पहनकर छलावा कर रहे हैं। कांग्रेस ने बाबा साहब और दलित समाज का अपमान किया, जिसे दलित समाज कभी नहीं भुला सकता। बीजेपी भी पीछे नहीं है। इनके वरिष्ठ मंत्री ने बाबा साहब का अपमान किया, लेकिन अब तक कोई पश्चाताप नहीं किया। खबर में आगे बढ़ने से पहले पोल पर अपनी राय दें। 5- दिल्ली चुनाव में बसपा बेहतर प्रदर्शन करेगी, बशर्ते चुनाव निष्पक्ष हो
दिल्ली चुनाव में बसपा अकेले चुनाव लड़ रही है। पहले से बेहतर प्रदर्शन करेगी, बशर्ते चुनाव निष्पक्ष हो। ईवीएम में गड़बड़ी न हो। उन्होंने बीजेपी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस पर जनता को लालच देने का आरोप लगाया। कहा-दिल्ली सरकार ने कोरोना काल में उत्तर प्रदेश के श्रमिकों के साथ दुर्व्यवहार किया था। सीएम योगी और अखिलेश ने मायावती को दी बधाई
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने मायावती को जन्मदिन की बधाई दी। सीएम योगी ने भी बसपा प्रमुख को जन्मदिन की शुभकामनाएं दी। कहा- प्रभु श्रीराम की कृपा आप पर बनी रहे। आप दीर्घायु और स्वस्थ्य हों। मायावती के संघर्ष, उनके राजनीति में आने, सीएम बनने और अब सियासत में पिछड़ने की पूरी कहानी सिलसिलेवार पढ़ते हैं— मायावती पैदा हुईं तो दूसरी शादी करना चाहते थे पिता
15 जनवरी 1956 को दिल्ली में रहने वाले डाक-तार विभाग के क्लर्क प्रभुदास के घर एक बच्ची की किलकारी गूंजी। नाम रखा मायावती। मायावती अपने घर की तीसरी बेटी थीं। उस समय उनका कोई भाई नहीं था। घर में लगातार तीसरी बार लड़की के जन्म से पिता प्रभुदास दुखी हो गए। उन्हें अपना वंश आगे बढ़ाने के लिए एक बेटा चाहिए था। मायावती के जन्म के बाद प्रभुदास के रिश्तेदारों ने उन्हें उनकी पत्नी राम रती के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। उनका कहना था कि राम रती ने लगातार तीन बेटियां पैदा की हैं। अगर उन्हें लड़का चाहिए तो दूसरी शादी कर लें। प्रभुदास ने कुछ वक्त सोचा वो भी दूसरी शादी के लिया तैयार हो गए। मायावती के दादा मंगलसेन को जब यह बात बता चली तो वह नाराज हो गए। उन्होंने प्रभुदास को दूसरी शादी करने से रोक दिया। लकड़बग्घा मुझे खाए इससे पहले मैं इसे खा जाऊंगी…
एक बार की बात है। मायावती अपने ननिहाल सिमरौली गई हुईं थीं। गांव के पास ही काली नदी बहती है। वो अपने नाना के साथ उसी नदी के पास खड़ीं थीं, तभी लकड़बग्घा वहां से गुजरने लगा। मायावती के नाना ने उन्हें पकड़ा और लकड़बग्घे से दूर ले गए। मायावती ने पूछा- नाना ये क्या है? नाना ने बताया कि लकड़बग्घा है, इससे दूर ही रहना वरना खा जाएगा। नाना ने इतना बोलकर दूसरी तरफ देखा ही था कि मायावती ने कहा- यह मुझे कैसे खाएगा? मैं ही इसे खा जाउंगी। इतना बोलकर वो लकड़बग्घे के पीछे दौड़ पड़ीं। आगे कुछ गांव वालों ने मायावती को लकड़बग्घे के पीछे दौड़ते देखा तो उन्हें रोक लिया। इस पूरे किस्से का जिक्र लेखक अजय बोस ने मायावती पर लिखी ‘बहनजी’ नाम की किताब में किया है। 10 साल की उम्र में मायावती ने छोटे भाई की जान बचाई
मायावती 5वीं क्लास में थीं। उनकी मां प्रेग्नेंट थीं। एक दिन अचानक उनको पेट में दर्द हुआ। पास के अस्पताल में एडमिट कराया गया। उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया। लेकिन जन्म के दो दिन बाद ही उस बच्चे को निमोनिया हो गया। उस वक्त मायावती के पिता घर के किसी काम से गाजियाबाद गए थे। बच्चे के इलाज के लिए उसे 6 किलोमीटर दूर राजेंद्र नगर की सरकारी डिस्पेंसरी में ले जाना था। पिता घर में नहीं थे और मां बिस्तर से उठने की हालत में नहीं थीं। मायावती उस वक्त सिर्फ 10 साल की थीं। उन्हें कुछ भी समझ नहीं आया। उन्होंने पिता का डिस्पेंसरी कार्ड उठाया। एक बोतल में पानी भरा और भाई को गोद में लेकर चल पड़ीं। रास्ते में जब वो बच्चा रोता तो मायावती उसके मुंह में पानी की कुछ बूंदें डाल देती थीं। रास्ता लंबा था। जब भी वो थक जातीं बच्चे को कभी दाएं कंधे की तरफ तो कभी बाएं कंधे की तरफ कर लेतीं। पसीने से तरबतर आखिर में अस्पताल पहुंच गईं। डॉक्टरों ने देखा तो हैरान रह गए। बच्चे का इलाज शुरू हुआ। इंजेक्शन लगे और तीन घंटे बाद उसकी हालत में सुधार आ गया। मायावती ने इसके बाद बच्चे को फिर से गोद में उठाया और पैदल ही घर के लिए निकल लीं। जब घर पहुंची तो रात के साढ़े नौ बज गए थे। स्कूल में पढ़ाती थीं मायावती; IAS बनने का सपना था किताब ‘बहनजी’ में अजय बोस लिखते हैं- मायावती के बाद प्रभुदास को लगातार 6 बेटे हुए। वह इस बात से फूले नहीं समाते थे कि वह 6 बेटों के पिता हैं। बेटों के आने से अपनी बेटियों के प्रति उनका व्यवहार भी बदल गया। सभी भाई-बहनों में मायावती पढ़ने में सबसे अच्छी थीं, लेकिन फिर भी उनके पिता में लड़की होने की वजह से उनका और बहनों का एडमिशन सस्ते सरकारी स्कूल में करवाया, जबकि बेटों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया गया। इस भेदभाव से आहत मायावती ने ठान ली कि वो बहुत मेहनत करेंगी और IAS बनेंगी। 1975 में उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस और इकॉनॉमिक्स से BA किया। उसके बाद बीएड करके वो स्कूल में टीचर के तौर पर काम करने लगीं। दिन में पहले पढ़ातीं फिर घर जाकर UPSC की तैयारी करतीं। इसके साथ ही उन्होंने LLB की डिग्री भी हासिल की। कांशीराम ने कहा था- मैं तुम्हारे सामने IAS की लाइन लगा दूंगा
UPSC की तैयारी के वक्त ही दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में एक सम्मेलन हो रहा था। मायावती भी वहां मौजूद थीं। उस वक्त के स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण भी थे। उनका भाषण शुरू हुआ। उन्होंने जैसे ही दलितों को हरिजन कहकर संबोधित किया मायावती नाराज हो गईं। वो स्टेज पर चढ़ीं और उन्होंने इसका विरोध किया। वहां मौजूद लोगों ने मायावती के इस फायरब्रांड अवतार की खूब सराहना की। सम्मेलन खत्म हुआ। हर जगह इस घटना की चर्चा होने लगी। कांशीराम को जब यह बात पता चली तो अगले ही दिन वो मायावती से मिलने उनके घर पहुंच गए। मायावती उस समय लालटेन की रोशनी में पढाई कर रहीं थीं। कांशीराम ने उनसे पूछा तुम क्या बनना चाहती हो? मायावती बोलीं- मैं IAS अफसर बनना चाहती हूं, ताकि अपने समाज के लिए कुछ कर सकूं। मायावती का यह जवाब सुनकर कांशीराम ने कहा-मैं तुम्हें उस मुकाम पर ले जाऊंगा, जहां दर्जनों IAS अफसर तुम्हारे सामने लाइन लगाकर खड़े होंगे। सही मायने में तुम तब अपने समाज की सेवा कर पाओगी। अब तुम तय कर लो, तुम्हें क्या करना है?” राजनीति के लिए मायावती ने अपना घर छोड़ दिया मायावती ने कांशीराम की इस बात पर सोच-विचार किया। आखिरकार वो उनके आंदोलन से जुड़ने को तैयार हो गईं, लेकिन आगे बढ़ने से पहले मायावती के लिए चुनौतियां उनके घर से ही शुरू हो गईं। उनके पिता नहीं चाहते थे कि वो राजनीति में जाएं। इसलिए उन्होंने मायावती पर सब छोड़कर UPSC की तैयारी करने का दबाव डाला। मायावती को पिता की यह इच्छा अब मंजूर नहीं थी। उन्होंने टीचिंग से जुटाई कमाई इकट्ठा की, सूटकेस में कपड़े भरे और घर छोड़ दिया। हालांकि, उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो किराए पर कमरा ले पाएं। इसलिए वह संगठन के ऑफिस में आकर रहने लगीं। इसके बाद वह कांशीराम के साथ तमाम आंदोलन में शामिल होने लगीं। पहले तीन चुनावों में हार से शुरू हुआ मायावती का राजनीतिक सफर
साल 1984 में जब बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा की स्थापना हुई तब मायावती उसकी कोर टीम का हिस्सा थीं। उन्होंने साल 1984 में पहली बार कैराना लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गईं। उसके बाद 1985 में बिजनौर और 1987 में हरिद्वार से भी हार गईं। फिर, 1989 के उपचुनाव में मायावती बिजनौर सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंच गईं। साल 1991 में एक बार फिर लोकसभा चुनाव हुए। बसपा दो ही सीटें जीत सकी। मायावती बिजनौर और हरिद्वार दोनों जगह से चुनाव हार गईं। यह तो थी मायावती के बचपन से लेकर उनके राजनीति में पहुंचने तक की कहानी। आगे बात मायावती के जीवन से जुड़े एक किस्से की, जिन्हें वो जीवन भर शायद भुला नहीं पाएंगी… पहला किस्सा: जब मायावती के एनकाउंटर की कोशिश की गई
दिसंबर 1991, जगह बुलंदशहर। मायावती और एक DM के बीच बैलेट पेपर देखने के लिए छीना-झपटी होने लगी। बात हाथापाई तक पहुंच गई। इसी मामले में मायावती को गिरफ्तार कर बुलंदशहर से प्रयागराज के नैनी सेंट्रल जेल लाया गया। इसके बाद हाईकोर्ट में पेशी के लिए उन्हें लखनऊ ले गए। लखनऊ से लौटते वक्त ट्रेन प्रयाग स्टेशन के पास खड़ी हुई। माया को वहीं ट्रेन से नीचे उतारा गया। जैसे ही वो रेलवे लाइन पार कर रहीं थीं एक पुलिस इंस्पेक्टर ने उनका एनकाउंटर करने के लिए अपनी रिवॉल्वर निकाली। वो फायर करता उससे पहले ही ट्रेन में मौजूद आर्मी के जवानों ने उसे देखा और रोक दिया। आर्मी के जवानों की वजह से मायावती की जान बच गई। मायावती के एनकाउंटर की कोशिश का यह किस्सा उनके करीबी सरवर हुसैन ने मीडिया से शेयर किया था। कुछ वक्त बीता। मायावती जेल से रिहा हुईं। कांशीराम के सहयोग से उन्होंने सियासत के दांव पेच सीखे। वो एक बेहतरीन और तेज-तर्रार वक्ता थीं, इसलिए उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। साल 1993 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर UP में चुनाव लड़ा और सरकार बना ली। इसके बाद 3 अप्रैल 1994 को वो राज्यसभा पहुंच गईं। उच्च सदन में BSP की वो पहली सांसद थीं। UP की पहली दलित महिला CM बनीं मायावती साल 1995 में राज्यपाल ने मुलायम सिंह यादव को बाहर का रास्ता दिखा दिया और मायावती भाजपा के समर्थन के साथ UP की CM बन गईं। CM की कुर्सी तक पहुंचने वाली वो देश की पहली दलित महिला थीं। उस वक्त के PM पी.वी.नरसिम्हा राव ने इसे ‘लोकतंत्र का चमत्कार’ कहा था। इसके बाद धीरे-धीरे मायावती सियासत की मंझी हुई खिलाड़ी बन गईं। संघर्ष हुआ, सियासी गुणा-भाग हुआ, लेकिन मायावती का सटीक निशाना लगता रहा। इसके बाद साल 1997, 2002 और 2007 में भी मायावती ने CM के तौर पर UP की कमान संभाली। इसी बीच साल 2003 में उन्हें BSP का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। तब से लेकर आज तक वो BSP की सबसे बड़ी नेता और UP की सियासत के बड़े चेहरे के रूप में जानी जाती हैं।

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