हिंदी निबंध में फेल हो गए थे विनोद शुल्क:टीचर ने कहा- क्या लिखते हो कुछ समझ नहीं आता; अब मिलेगा सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान

साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल बीएससी फर्स्ट ईयर में हिंदी निबंध और ऑर्गेनिक केमेस्ट्री सब्जेक्ट में फेल हो गए थे। टीचर कहते थे क्या लिखते हो कुछ समझ नहीं आता। अब उन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने जा रहा है। हिंदी के शीर्ष कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल के लिखने की प्रेरणा उनकी मां रुक्मणी शुक्ल से मिली। उनकी मां ने कहा जो देखते हो उसे जरूर लिखो। आगे चलकर गजानन माधव मुक्तिबोध और हरिशंकर परसाई जैसे साहित्यकारों ने शुक्ल की कविताओं का सराहा और उनकी साहित्यिक यात्रा में उनका मार्गदर्शन किया । घर में रहा साहित्यिक माहौल विनोद कुमार शुक्ल का जन्म 1 जनवरी 1937 को राजनांदगांव में हुआ। 6 चाचा के साथ पूरा परिवार साथ में रहता था। उनकी मां रुक्मणी शुक्ल का जन्म बंगाल में हुआ था। साहित्य के प्रति उनका काफी जुड़ाव था। वहीं उनके चचेरे भाई भगवति चरण शुक्ल भी लिखते थे। घर में साहित्य से जुड़ी किताबें-पत्रिकाएं आया करती थी। जिन्हें विनोद कुमार शुक्ल भी पढ़ते थे। एक समय विनोद कुमार शुक्ल की लेखनी में भवानी प्रसाद मिश्र की कुछ पंक्तियां आ गई थी। तब उनके बड़े भाई ने उन्हें डांटा था। उस दौरान उनकी मां ने उन्हें समझाया था कि जिस तरह चीजों को छानने के लिए छन्नी का इस्तेमाल करते हैं। उसी तरह तुम मन में एक छन्नी बना लो। ताकि दूसरों का लिखा हुआ तुम्हारे लेखन में ना आए और तुम्हारा लिखा मौलिक हो। जब मुक्तिबोध को विनोद की कविताएं पसंद आई राजनांदगांव में गजानन माधव मुक्तिबोध से विनोद कुमार शुक्ल मिलते थे और अपनी लिखी कविताएं उन्हें दिखाते थे। ऐसे ही एक दिन विनोद शुक्ल अपनी लिखी कविताएं मुक्तिबोध के पास ले गए। उनमें से आठ कविताएं उन्हें बहुत अच्छी लगी। मुक्तिबोध ने ही उनकी आठ कविताओं को साहित्यक पत्रिका कृति में प्रकाशित करने के लिए भेजा था। यहां से विनोद कुमार शुक्ल के लिखने का सिलसिला धीरे-धीरे बढ़ता गया। 1971 में उनकी कविताओं का पहला संग्रह ‘लगभग जय हिंद’ प्रकाशित हुआ। 1979 में उनका पहला उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ प्रकाशित हुआ, आगे इस पर फिल्म भी बनी। टीचर कहते थे तुम क्या लिखते हो समझ नहीं आता विनोद कुमार शुक्ल के बेटे शाश्वत शुक्ल बताते हैं कि राजनांदगांव के स्टेट हाई स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके पिता ने 50 के दशक में रायपुर के साइंस कालेज में एडमिशन लिया था। बीएससी की पढ़ाई के दौरान वे हिंदी निबंध के पेपर में फेल हो गए थे। उस दौरान उनके टीचर उनसे कहते थे -विनोद तुम क्या लिखते हो हमें समझ नहीं आता है। इसके बाद साइंस कॉलेज छोड़कर वे कृषि विषय में पढ़ाई करने जबलपुर गए और जबलपुर विश्वविद्यालय में एडमिशन लेकर अपनी पढ़ाई पूरी की। कुछ दिन वे स्कूल में शिक्षक रहे। आगे चलकर रायपुर के कृषि महाविद्यालय में उन्होंने कृषि विस्तार विषय पढ़ाया। 1996 में विनोद शुक्ल सह प्राध्यापक के पद से रिटायर हुए। हरिशंकर परसाई ने भी की मदद जबलपुर विश्वविद्यालय में कृषि की पढ़ाई करने के दौरान विनोद कुमार शुक्ल साहित्यकार हरिशंकर परसाई से मिला करते थे। इस दौरान वे अपने लेखन और कविताओं को लेकर चर्चा करते थे। हरिशंकर परसाई ने उनकी लेखन यात्रा में मदद की। ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले 12वें हिंदी लेखक हिंदी के प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ के पहले साहित्यकार हैं, जिन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलेगा। 88 साल के शुक्ल कहानीकार, कवि और निबंधकार हैं। हिंदी के समकालीन लेखकों में हैं। वे ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले 12वें हिंदी लेखक हैं। ‘नौकर की कमीज, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ और ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ उनकी प्रमुख किताबें हैं। अमेरिकन नाबोकॉव अवॉर्ड पाने वाले पहले एशियाई विनोद कुमार शुक्ल कविता और उपन्यास लेखन के लिए गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप, रजा पुरस्कार, वीरसिंह देव पुरस्कार, सृजनभारती सम्मान, रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार, दयावती मोदी कवि शिखर सम्मान, भवानीप्रसाद मिश्र पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, पं. सुन्दरलाल शर्मा पुरस्कार जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं। उन्हें उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए 1999 में ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार भी मिल चुका है। हाल के सालों में उन्हें मातृभूमि बुक ऑफ द ईयर अवॉर्ड भी दिया गया है। पिछले साल ही उन्हें पेन अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के लिए नाबोकॉव अवॉर्ड से सम्मानित किया था। एशिया में यह सम्मान पाने वाले वे पहले साहित्यकार हैं। इन कविताओं को भी सराहा गया इसी तरह लगभग जयहिंद, वह आदमी चला गया, नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह, सब कुछ होना बचा रहेगा, अतिरिक्त नहीं, कविता से लंबी कविता, आकाश धरती को खटखटाता है, जैसे कविता संग्रह की कविताओं को भी दुनिया भर में सराहा गया है। बच्चों के लिए लिखे गए हरे पत्ते के रंग की पतरंगी और कहीं खो गया नाम का लड़का जैसी रचनाओं को भी पाठकों ने खूब पसंद किया। दुनिया भर की भाषाओं में उनकी किताबों के अनुवाद हो चुके हैं। जानिए ज्ञानपीठ पुरस्कार के बारे में ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ न्यास की तरफ से भारतीय साहित्य के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है। भारत का कोई भी नागरिक जो 8वीं अनुसूची में बताई गई 22 भाषाओं में से किसी भाषा में लिखता हो, इस पुरस्कार के योग्य है। पुरस्कार में 11 लाख रुपए, प्रशस्तिपत्र और वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा दी जाती है। 1965 में 1 लाख रुपए की पुरस्कार राशि से शुरू हुए इस पुरस्कार को 2005 में 7 लाख रुपए कर दिया गया, जो वर्तमान में 11 लाख रुपए हो चुका है। पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार 1965 में मलयालम लेखक जी शंकर कुरुप को दिया गया था। ……………….. ये खबर भी पढ़ें… छत्तीसगढ़ के साहित्यकार विनोद शुक्ल को ज्ञानपीठ: प्रदेश से किसी साहित्यकार को पहली बार सम्मान मिलेगा, ‘नौकर की कमीज’ पर बन चुकी है फिल्म छत्तीसगढ़ के रायपुर के रहने वाले हिंदी के शीर्ष कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल को इस साल का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाएगा। इसकी घोषणा आज (शनिवार) नई दिल्ली में ज्ञानपीठ चयन समिति ने की है। छत्तीसगढ़ से किसी साहित्यकार को पहली बार ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलेगा। पढ़ें पूरी खबर

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