हिंदी साहित्य समिति इंदौर में अमीर खुसरो को याद किया:चार भाषाओं के महान कवि की कालजयी पहेलियां और मुकरियां आज भी प्रासंगिक

मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति ने कालजयी साहित्यकार स्मरण श्रृंखला के 97वें पुष्प को महान कवि अमीर खुसरो को समर्पित किया। कार्यक्रम के प्रचारमंत्री हरेराम वाजपेयी ने बताया कि संवत् 1253 में जन्मे अमीर खुसरो ने हिंदी, हिंदवी, ब्रज और फारसी भाषाओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकृति, समाज और भारतीय जीवन की विविध विधाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया। खुसरो की मुकरियां और पहेलियां हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर मानी जाती हैं। उन्होंने ‘पंचगंज’ के नाम से प्रसिद्ध पांच महत्वपूर्ण कृतियां – मल्लोल अनवर, शिरीन खुसरो, मजनूं लैला, आईने सिकंदरी और हश्त विहीश्त लिखीं, जिन्हें उन्होंने अपने गुरु को समर्पित किया। संवत् 1325 में इस महान साहित्यकार का निधन हुआ। यद्यपि वे मूलतः हिंदू थे, लेकिन परिस्थितियों के कारण उन्हें धर्म परिवर्तन करना पड़ा। फिर भी, उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति की गहरी समझ और प्रेम झलकता है। आज भी उनकी रचनाएं साहित्य जगत में प्रासंगिक हैं और नई पीढ़ी को प्रेरित करती हैं। भारतीय लोक संस्कृति के दर्शन कराता है खुसरो का साहित्य डॉ. आरती दुबे ने खुसरो पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनका लिखा साहित्य भारतीय लोक संस्कृति के दर्शन कराता है। उत्कृष्ट साहित्य लेखक होने के बाद भी वो विवादास्पद भी रहे। श्री भरत उपाध्याय ने कहा कि खुसरो जी को कई भाषाएं आती थीं, विशेषकर फारसी, पर खड़ी बोली हिन्दी के वे पहले कवि माने जाते हैं। निजामुद्दीन औलिया के वे परम भक्त थे और उनकी मृत्यु के बाद वो स्वयं भी अधिक समय तक जीवित नहीं रहे। अरविंद जोशी ने मुकरी और पहेलियों के अंतर बताए, साथ ही बताया कि जलालुद्दीन ने उन्हें ’अमीर’ की उपाधि से नवाजा था, वो एक दरबारी कवि रहे फिर भी भारतीय संस्कृति से जुड़े रहे। डाॅ. दीप्ति गुप्ता ने कुछ पहेलियों को पढ़कर श्रोताओं से उनके उत्तर मांगे, जो बड़ा आनंद दायक रहा। डाॅ. रागिनी स्वर्णकार ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम ज्ञानवर्धक होते हैं। कु. महिमा त्रिवेदी ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों से निश्चित रूप से साहित्यिक और सामाजिक ज्ञान प्राप्त होता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए समिति के कार्यवाहक प्रधानमंत्री घनश्याम यादव ने कहा कि समिति का उद्देश्य है कि जिन साहित्यकारों को लोग भूल चुके हैं उनको और उनके साहित्य को हम जीवंत करें। इस अवसर पर प्रकाशन मंत्री अनिल भोजे, अर्थमंत्री राजेश शर्मा, पुस्तकालय मंत्री अरविन्द ओझा, नयन राठी, विजय खंडेलवाल, रामाश्रय पाण्डेय, डाॅ. आभा होल्कर आदि साहित्यकार उपस्थित थे।

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