रांची में करीब 1.75 लाख घर बिना नक्शा के बने हुए हैं। पिछले 15 सालों में दो बार नगर निकाय चुनाव हुए। चुनाव से पहले राजनीति पार्टियों से समर्थित उम्मीदवारों ने अपने घोषणा पत्र में बिना नक्शा के बने भवनों को नियमित कराने का वादा किया था, लेकिन आज तक वे वादे पूरे नहीं हुए। हालांकि, पूर्व की रघुवर सरकार ने 2019 में हुए विधानसभा चुनाव से पहले कैबिनेट से बिल्डिंग रेगुलराइजेशन पॉलिसी को स्वीकृति दी थी। लेकिन इसके नियम इतने पेचीदे थे कि मात्र 210 घरों का ही नक्शा पास हुआ। इसके बाद हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 2022 में नगर निकाय चुनाव की सरगर्मी शुरू होने से पहले राज्यभर के करीब 7 लाख भवनों को नियमित करने के लिए रेगुलराइजेशन पॉलिसी बनाने का निर्देश दिया। इसके लिए 10 अधिकारियों की एक कमेटी बनी, जिसने दूसरे राज्य में बनी रेगुलराइजेशन पॉलिसी का अध्ययन करके अपनी रिपोर्ट दी। लेकिन निकाय चुनाव टलने के बाद यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। इसका नतीजा हुआ कि आम लोग जो बिना नक्शा के घर बनाकर रह रहे हैं, उनका भयादोहन हो रहा है। नगर निगम और आरआरडीए ऐसे भवनों पर अवैध निर्माण का केस दर्ज करता है। इसके बाद भवन मालिक का जीवन कोर्ट-कचहरी का चक्कर काटते हुए गुजर जाता है। ऐसे में अब लोग पूछ रहे हैं क्या हुआ तेरा वादा… भाजपा की पॉलिसी से मात्र 1100 को फायदा भाजपा सरकार ने दो बार भवनों को रेगुलराइज करने के लिए पॉलिसी बनाई। पहली बार वर्ष 2011 में अर्जुन मुंडा की सरकार ने रेगुलराइजेशन पॉलिसी को लागू किया था। वह पॉलिसी अच्छी थी, लेकिन निगम के तत्कालीन अफसरों ने नियमों को अपने तरीके से परिभाषित किया। इस वजह से पैरवी-पैसा वाले मात्र 890 लोगों के भवन नियमित हुए। इसके बाद रघुवर सरकार पॉलिसी लेकर आई। लेकिन उसमें भी 210 भवन ही नियमित हुए। क्योंकि, नियम ऐसे बनाए गए थे कि सभी लोगों को उसका फायदा नहीं मिल सकता। रेगुलराइजेशन का प्रस्ताव अंतत: विभाग में फंसा 27 अप्रैल 2023 को निगम बोर्ड का कार्यकाल समाप्त हुआ था। इससे पहले हुई बोर्ड की बैठक में शहर के सभी घरों को नियमित करने के लिए रेगुलराइजेशन पॉलिसी को सरल करके लागू करने का प्रस्ताव पास हुआ था। यह प्रस्ताव नगर विकास विभाग को भेजा गया। इसके बाद विभाग ने सभी नगर निकायों में 31 दिसंबर 2019 से पहले बने भवनों को रेगुलराइज कराने के लिए अनधिकृत निर्माण को नियमितीकरण करने की योजना-2022 का ड्रॉफ्ट जारी किया। ड्रॉफ्ट पर आपत्ति सुझाव मांगा गया, लेकिन जो नियम बनाए गए थे,उसे देखते हुए मात्र 2 सुझाव मिले। इसके बाद फाइनल ड्रॉफ्ट पर सरकार आगे नहीं बढ़ा। अवैध निर्माण का केस कर दवाब बनाता है निगम शहर में बिना नक्शा के बने भवनों का फायदा नगर निगम के अधिकारी उठाते हैं। दरअसल, जब भी निगम में नए अधिकारी आते हैं पहला फोकस अवैध कमाई पर होता है। बिना नक्शा के बने भवन को कमाई का जरिया बनाया जाता है। ऐसे भवनों को चिह्नित करके उस पर अवैध निर्माण का केस किया जाता है। कई बार बजुमंजिली भवन को सील कर दिया जाता है। लेकिन डील फाइनल होने के बाद सील खोल दिया जाता है। दूसरी आेर सामान्य घर बनाकर रहने वाले भवन मालिक नगर निगम से लेकर आरआरडीए ट्रिब्यूनल आैर हाईकोर्ट तक राहत के लिए चक्कर लगाते हैं। पार्टियां ऐसे भवनों पर राजनीतिक रोटी सेंकती रही हैं। कागजात नहीं होने से बिना नक्शा के बने घर रांची नगर निगम व आरआरडीए क्षेत्र में करीब 2.50 घर बने हुए हैं। इसमें से 50 हजार घरों का नक्शा पास है। 1.75 लाख घर बिना नक्शा के हैं। क्योंकि, करीब 50% घर ऐसे हैं, जो आदिवासी जमीन पर बने हैं। सीएनटी एक्ट लागू होने की वजह से आदिवासी जमीन का स्थानांतरण नहीं हो सकता। ऐसे में उक्त जमीन पर भवन का नक्शा भी पास नहीं हो सकता। इसलिए अधिकतर लोगों ने सादा पट्टा पर जमीन लेकर बिना नक्शा पास कराए ही घर बना लिया है। कई भवन ऐसे भी हैं, जिसका निर्माण जनरल जमीन पर किया गया है, लेकिन जागरुकता नहीं होने की वजह से लोगों ने नक्शा पास नहीं कराया। सुजीत भगत, आर्किटेक्ट 2022 में 7 लाख भवनों को नियमित करने के लिए कमेटी बनी, रिपोर्ट भी बनी, बाद में मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया मेरी योजना, कितनी हुई मेरी बिल्डिंग रेगुलराइजेशन बहुत जटिल है नक्शा पास करने की प्रक्रिया नक्शा पास कराने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि आम लोग घर बना ही नहीं सकते। एमपी सहित अन्य राज्यों में भवन का नक्शा पास कराने के लिए जमीन की प्रकृति बाधा नहीं बनती। लेकिन यहां जमीन के कागजात की जांच कराने में ही लोगों के पसीने छूट जाते हैं। इससे बचने के लिए बिना नक्शा पास कराएं लोग घर बना लेते हैं। इतने घरों को तोड़ना कभी भी समाधान नहीं हो सकता। हर हाल में ऐसे भवनों को नियमित करना ही होगा। सरकार को ऐसी पॉलिसी बनाने की जरूरत है,जो वोट बैंक से परे हो। अधिक से अधिक भवन नियमित हो,इस उद्देश्य से पॉलिसी बननी चाहिए।


