बालाघाट जिले के वारासिवनी में रहने वाले उपेंद्र बांगरे के करीब सौ साल पुराने खंडहरनुमा मकान को जब तोड़ा जा रहा था, तब उसके भीतर से चार दुर्लभ सफेद उल्लू मिले। जैसे ही इन उल्लुओं के मिलने की खबर फैली, उन्हें देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। इन उल्लुओं को अब सुरक्षित रूप से वन विभाग के हवाले किया जाएगा। वन्यजीव विशेषज्ञ अभय कोचर ने बताया कि ये ‘बार्न आउल’ प्रजाति के उल्लू हैं, जिन्हें आम भाषा में ‘खलिहानी उल्लू’ कहा जाता है। इनकी सबसे बड़ी पहचान इनका दिल (हार्ट) के आकार का चेहरा और छोटी चोंच और आंखें हैं। इन्हें किसानों का सबसे अच्छा मित्र माना जाता है क्योंकि ये बड़ी संख्या में खेतों और खलिहानों के चूहों का शिकार करते हैं, जिससे फसलें सुरक्षित रहती हैं। खंडहरों में बसेरा और अस्तित्व पर संकट ये उल्लू अक्सर पुरानी इमारतों, खंडहरों और पेड़ों के खोखले हिस्सों में रहना पसंद करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आज के समय में जादू-टोना और उनके रहने की जगहों के खत्म होने के कारण इन दुर्लभ पक्षियों की जान पर संकट मंडरा रहा है। प्रकृति के संतुलन और किसानों की भलाई के लिए इन सफेद उल्लुओं का संरक्षण बहुत जरूरी है।


