103 एकड़ में तरबूज, मिर्च, टमाटर, नारियल पपीते व खीरा की खेती, 21 राज्यों में डिमांड

भास्कर न्यूज | बालोद नवाचार से जिले के 103 एकड़ रकबे में तरबूज, मिर्च, टमाटर, पपीते की खेती कर दो युवा किसान गोंविदा कुमार और अनुकुल ढाली लगभग 200 लोगों को रोजगार दे रहे हैं। भविष्य में एक हजार एकड़ में तरबूज की खेती से 800 लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने की प्लानिंग है। दरअसल वर्तमान में तांदुला व गोंदली बांध में 90% से ज्यादा पानी भरा है। इस वजह से डुबान क्षेत्र में एक हजार एकड़ में तरबूज की खेती नहीं हो रही है। यहां पिछले चार साल से तरबूज की खेती होने से 800 लोगों को रोजगार मिल रहा था। हालांकि भविष्य में यहां खेती करने की प्लानिंग बनी है। अनुकुल ढाली ने बताया कि वर्तमान में दल्ली माइंस चिखली क्षेत्र के 70 एकड़ में तरबूज की खेती हो रही है। जिससे 160 लोगों को रोजगार मिल रहा है। वहीं गोंविदा कुमार ने बताया कि 14 एकड़ में मिर्च, 10 एकड़ में पपीता, 3 एकड़ में खीरा, 3 एकड़ में टमाटर, 3 एकड़ में नारियल व कटहल की खेती हो रही है। जिससे 40 लोगों को रोजगार मिल रहा है। दूसरे राज्य के किसानों से आइडिया लेकर यहां खेती गोंविदा कुमार, अनुकुल ने बताया कि कोरोना काल 2020 में जब लॉकडाउन लगा था। तब महाराष्ट्र सहित दूसरे राज्य के उन्नतिशील किसानों से आइडिया लेकर जिले में परंपरागत के बजाय आधुनिक खेती शुरू की। शुरुआत में नुकसान का सामना भी करना पड़ा लेकिन खेती जारी रखी। वर्तमान में खेती से अच्छा मुनाफा हो रहा है, क्योंकि यहां से उत्पादित तरबूज, मिर्च, टमाटर, पपीते की डिमांड देश के 21 राज्यों में है। तरबूज की खेती का रकबा बढ़ रहा है। सीजन में डिमांड, इसकी खेती में मुनाफा ज्यादा कृषि विभाग के उप संचालक आशीष चंद्राकर ने बताया कि सीजन में डिमांड होने की वजह से खरबूज, मिर्च, पपीते, टमाटर की खेती में धान की तुलना में मुनाफा ज्यादा है। धान की तुलना में इनकी खेती में पानी की खपत भी कम होती है। मिट्टी की उर्वरा क्षमता अनुकुल होने से उत्पादन भी ज्यादा होता है। पहले परंपरागत धान या सब्जी की खेती करते थे अनुकूल ढाली ने बताया कि जिले के किसान पहले परंपरागत धान या सब्जी की खेती कर रहे थे। हमनें 40 एकड़ में तरबूज की खेती कर नया प्रयोग किया। जो सफल रहा। तरबूज को खरीदने खुद व्यापारी यहां आते हैं। दाम भी अच्छा मिलता है इसलिए धान से दोगुना मुनाफा हो रहा है। धोबनी, पल्लेकसा, खल्लारी, वनपाण्डेल, बोरिद, घोटिया, भैंसबोड के अलावा बांध किनारे और आसपास के 20 गांव में तरबूज की खेती होने से रोजगार मिल रहा है। नौकरी छोड़ कर्ज लेकर रेगहा में खेती की शुरुआत गोविंदा ने बताया कि 10 साल पहले प्राइवेट कंपनी में फील्ड अफसर था। कुछ नवाचार करने की चाह में नौकरी छोड़कर रेगहा जमीन में कई राज्यों के किसानों से सीखी तकनीक का उपयोग कर यहां रेगहा जमीन में खेती की शुरुआत की। कोरोना काल में लॉकडाउन होने की वजह से नुकसान का सामना करना पड़ा। बैंक का कर्ज चुकाना चुनौती रहा बावजूद हार नहीं मानकर नई तकनीक, टपक सिंचाई पद्धति से खेती जारी रखा।

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