भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. बीरेंद्र स्वरूप द्विवेदी,
मृदा वैज्ञानिक, जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर मप्र की खेती के लिए सबसे अहम ज़मीन की सेहत बिगड़ चुकी है। मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड सर्वे बताता है कि लगभग 15 जिलों में नाइट्रोजन की भारी कमी है। ग्वालियर, भिंड, मुरैना, शिवपुरी, अशोकनगर, गुना, विदिशा, रायसेन, नर्मदापुरम, हरदा, बैतूल में 70% से अधिक कृषि भूमि में नाइट्रोजन स्तर निर्धारित मानक से काफी कम पाया गया है। इससे गेहूं और चना में पौधे हरे-भरे तो दिखेंगे लेकिन दाना नहीं भरेगा, पैदावार 20–25% तक घट सकती है। वहीं शिवपुरी, नीचम, सागर और शहडोल जिलों में कई जगहों की मिट्टी में फॉस्फोरस कम मिला है। इससे बीज का अंकुरण कमजोर होगा, जड़ें गहरी नहीं जाएंगी और पौधे समय पर पक नहीं पाएंगे। यदि बिना जांच खाद डालते हैं, तो इसका असर फसल की जड़ों और दाने पर पड़ता है। गेहूं और चना जैसी रबी फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक मानते हैं कि बोवाई से पहले खेत की मिट्टी को जांचना जरूर चाहिए। सोडियम अधिक है तो प्रति हेक्टेयर 1 से 2 टन जिप्सम डालें, एसिड घटाने के लिए किसान मिलाएं चूना मिट्टी की जांच इसलिए है बेहद जरूरी नाइट्रोजन और फॉस्फोरस के अलावा मध्यप्रदेश की मिट्टी में अन्य पोषक तत्वों का भी बड़ा असंतुलन है। शिवपुरी, देवास, आलीराजपुर और छतरपुर के कुछ हिस्सों में पोटाश कम मिला है। वहीं बैतूल, भिंड और सतना में पूरे जिले में ही जिंक की कमी दर्ज की गई है। आयरन की कमी रीवा, सिंगरौली, सीधी, शिवपुरी, बैतूल और वेस्ट निमाड़ जिलों के कुछ हिस्सों में दर्ज हुई है। मिट्टी का पीएच भी कई जिलों में बिगड़ा हुआ है। ग्वालियर, भिंड, मुरैना और शिवपुरी में मिट्टी अम्लीय है, जबकि छतरपुर, पन्ना और टीकमगढ़ में क्षारीय है। तो फिर किसान क्या करे… अलग-अलग तरह की मिट्टी और उनके समाधान 1. लवणीय मिट्टी: इसमें पीएच 8.8 से 9.3 तक पाया जाता है। पौधे पर्याप्त पानी नहीं खींच पाते, बीज ठीक से अंकुरित नहीं होते और पत्तियां पीली हो जाती हैं। समाधान के तौर पर नमक सहन करने वाली फसलें बोना बेहतर रहता है। खेत में ज्यादा पानी देकर अतिरिक्त लवण को बाहर निकाला जा सकता है। इस स्थिति में गोबर खाद और जैविक खाद सबसे उपयोगी रहती है।
2. क्षारीय मिट्टी: जब पीएच 9.3 से अधिक होता है तो इसमें सोडियम की मात्रा बढ़ जाती है। मिट्टी सख्त, दरारदार और चिपचिपी हो जाती है, जिससे पानी आसानी से नहीं उतरता। इस प्रकार की जमीन में चना और सरसों जैसी फसलें उपयुक्त रहती हैं। सुधार के लिए प्रति हेक्टेयर 1 से 2 टन जिप्सम डालना लाभकारी है। क्षारीय मिट्टी में बबूल और रतनजोत जैसी पौध प्रजातियां भी आसानी से उगाई जा सकती हैं।
3. अम्लीय मिट्टी: पीएच 6.5 से कम होने पर मिट्टी अम्लीय मानी जाती है। पौधों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। मिट्टी अक्सर कड़ी या ज्यादा नमी वाली मिलती है। इसका समाधान यह है कि जुताई से पहले चूना या लाइमस्टोन को समान रूप से खेत की मिट्टी में मिला दिया जाए। कैसे लें सैंपल, कहां कराएं जांच


