छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के पीढ़ापाल क्षेत्र में 25 गांवों के 50 परिवारों के 200 से अधिक ग्रामीणों ने अपने मूल धर्म में वापसी की है। मूल धर्म में लौटे ग्रामीणों ने बताया कि उनका धर्मांतरण आध्यात्मिक कारणों से नहीं, बल्कि बीमारी ठीक होने के दावों, भय और प्रलोभन के कारण हुआ था। उन्हें विश्वास दिलाया गया था कि बाइबिल के आदेशों का पालन करने से बीमारियां ठीक हो जाएंगी। ग्रामीणों पर केवल ईसामसीह को मानने का दबाव बनाया गया और पारंपरिक देवी-देवताओं को शैतान बताकर उनसे दूर रहने को कहा गया। उनसे हर सप्ताह अपने काम-काज छोड़कर चर्च जाने के लिए भी कहा जाता था। उन्हें यह भी विश्वास दिलाया जाता था कि ऐसा करने से धन लाभ होगा और जीवन की समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। हालांकि, समय के साथ ग्रामीणों को यह एहसास हुआ कि यह प्रक्रिया केवल धार्मिक नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, परंपरा और ग्राम समाज की एकता को कमजोर कर रही है। इस गहन आत्मचिंतन और ग्लानि के बाद उन्होंने सामूहिक रूप से अपने मूल धर्म में लौटने का निर्णय लिया। ग्रामीणों ने कहा कि सनातन और आदिवासी संस्कृति सर्वसमावेशी है, जहां सभी देवी-देवताओं और परंपराओं का सम्मान किया जाता है। उन्होंने इसे ही अपनी वास्तविक पहचान बताया।


