गुरमीत लूथरा अमृतसर नितनेम सेवक जत्था के प्रमुख सेवादार रजिंदर सिंह बग्गा (72) 25 साल से निरंतर गुरुद्वारा शहीदां साहिब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब के प्रकाश स्थल पर स्नान की सेवा एवं गुरबाणी के नितनेम के पाठ करने की सेवा निभा रहे हैं। गुरबाणी की उक्त पांच बाणिया (पाठ) उन्हें कंठस्थ हैं। अमृतधारी बग्गा प्रतिदिन अमृतवेले 1.30 बजे लोहारका रोड स्थित आरबी एस्टेट के निवास से 15 किलोमीटर दूर गुरुद्वारा बाबा दीप सिंह शहीदां के लिए निकलते हैं तथा 2 बजे स्नान सेवा के बाद अमृतवेले ही 2.45 बजे से 4 बजे तक नितनेम के पाठ करते हैं । गुरुद्वारा साहिब में आसां दी वार के पाठ के बाद ही पहली अरदास की जाती है। अरदास के बाद 5 बजे गुरुद्वारा साहिब के लिए वापस घर के लिए रवाना होते हैं। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अधीन चल रहे गुरुद्वारा शहीदां साहिब में एसजीपीसी की तरफ से उनकी यह ड्यूटी लगाई गई है। आधी हो या तूफान, गर्मी हो या सर्दी वह विशेष नियम के तहत रोजाना निर्विघ्न ड्यूटी का निर्वाह करते हैं। यही नहीं, प्रसिद्ध लेखक, शायर व पेंटर बग्गा पेंटिंग के अपने शौक के तहत बाबा दीप सिंह जी के सैंकडों पोट्रेट बनाकर सिख संगत में बांट चुके हैं। बाबा दीप सिंह जी के जन्म दिवस, शहीदी पर्व अन्य विशेष मौकों पर बग्गा अपने हाथों से बनाए बाबा दीप सिंह के पोट्रेट श्रद्धालुओं में बांटते हैं। बग्गा मात्र 13-14 साल की उम्र में ही मां के साथ गुरुद्वारा शहीदां साहिब में नतमस्तक होने के लिए जाने लगे थे। मां की प्रेरणा से उन्हें सेवा करने की लत लग गई थी। 25-30 साल की उम्र से उन्हें रोजाना गुरुद्वारा शहीदां में नतमस्तक होने की आदत पड़ गई थी। 50 साल की उम्र के आसपास एक दिन पत्नी बबली बग्गा ने उन्हें अमृतवेले जाकर सेवा करने के लिए प्रेरित किया तब से अभी तक वह न केवल अमृतवेले नतमस्तक होते हैं बल्कि सेवा करने का अपना धर्म भी निभा रहे हैं। बग्गा का कहना है कि सेवा करने से इंसान को पॉजिटिव एनर्जी हासिल होती है। अमृतवेले दर्शन करने व सेवा करने से ऐसा महसूस होता है कि जैसे शरीर की रग रग में पॉजिटिव एनर्जी दौड़ गई हो, जैसे मोबाइल की बैटरी चार्ज करने से मोबाइल सारा दिन के लिए चार्ज हो जाता है वहीं एक बार अमृतवेले सेवा करने मात्र से ही मनुष्य का शरीर पूरे दिन के लिए के लिए चार्ज हो जाता है।


