डिजिटल इंडिया के दावों के बीच विदिशा का मोहम्मदगढ़ गांव आज उस भारत की तस्वीर है, जहां मोबाइल हाथ में है, टावर गांव में खड़ा है, लेकिन नेटवर्क नहीं। नतीजा यह हुआ कि बीते तीन वर्षों में इस गांव से 50 से अधिक परिवार पलायन कर चुके हैं। यह पलायन न तो रोजगार की तलाश में हुआ और न ही किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से, यहां के लोग गांव सिर्फ इसलिए छोड़ गए क्योंकि वे दुनिया से कट गए थे। जिला मुख्यालय से करीब 80 किमी दूर बसे इस गांव की आबादी करीब 3 हजार है। अधिकांश लोगों के पास मोबाइल फोन हैं, लेकिन गांव में घुसते ही सिग्नल गायब हो जाता है। कॉल करनी हो, जरूरी सूचना लेनी हो या किसी से इमरजेंसी में बात करनी हो, तो ग्रामीणों को डेढ़ से दो किमी तक दूर जाना पड़ता है। कई बार मोबाइल हाथ में होता है, पर कॉल नहीं लगती। गांव में बीएसएनएल का मोबाइल टावर भी लगा है, लेकिन वह सिर्फ दिखता है, चलता नहीं। कभी-कभार सिग्नल आता है, फिर पूरा दिन गायब रहता है। इस अनिश्चितता ने लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को ठप कर दिया। सरपंच सरिता बाई वाल्मीकि बताती हैं कि नेटवर्क न होने से बच्चों की पढ़ाई सबसे ज्यादा प्रभावित हुई। ऑनलाइन कक्षाएं नहीं चल पाईं। नौकरी की सूचनाएं समय पर नहीं मिलती थीं। बैंक, दफ्तर और बाहर गए परिजनों से संपर्क टूट जाता था। वे कहती हैं- कई बार कोई बाहर गया सदस्य समय पर नहीं लौटा तो उससे बात नहीं हो पाती थी। घर वाले घबरा जाते थे। गांव छोड़ चुके लोगों की पीड़ा और भी गहरी है। कमलेश कुशवाह, जो अब विदिशा में रहते हैं, बताते हैं कि उनके नाना ससुर का निधन हो गया था, लेकिन उन्हें इसकी जानकारी एक महीने बाद मिली। बोले- ‘गांव में नेटवर्क नहीं था, किसी का फोन नहीं आया। जब पता चला, तब सब खत्म हो चुका था।’ इमरान खान, जो अब भोपाल में रहते हैं, बताते हैं कि नेटवर्क न होने से उनका रोजगार खत्म हो गया था। कहते हैं- ‘काम से जुड़ी कॉल नहीं आती थी, विभागों से संपर्क नहीं हो पाता था। मजबूरी में शहर आना पड़ा।’ आशीष सेन का कहना है कि इमरजेंसी में किसी से बात न हो पाने का डर सबसे बड़ा था। गांव छोड़ते ही परेशानी खत्म हो गई। किसी को निधन की सूचना एक माह बाद मिली, किसी का रोजगार ही खत्म नेटवर्क की जांच कराएंगे… बीएसएनएल के एजीएम राकेश रंजन का कहना है कि क्षेत्र में 2जी और 4जी नेटवर्क चल रहा है। नेटवर्क की जांच करवाएंगे।


