4 महीने तक नक्सलियों से लड़ने वाला डॉग सदमे में:जवान बोले– जिस रास्ते चलता, हम आंख मूंदकर बढ़ते थे; मास्टर की मौत के बाद गुमसुम

एमपी के बालाघाट जिले को नक्सल मुक्त बनाने में हॉक फोर्स के जवानों के साथ पुलिस के डॉग स्क्वॉड का भी अहम योगदान रहा है। खासतौर पर डाबरमैन ब्रीड की फीमेल डॉग ताशा और उसके मास्टर विनोद शर्मा का। हॉक फोर्स के जवान जब जंगल के स्याह अंधेरे में ऑपरेशन के लिए निकलते थे, तो ताशा के भरोसे ही बेखौफ आगे बढ़ते थे। जब तक ताशा आगे रहती, जमीन में दबे बारूद का हर खतरा बेअसर था। उसके होने से पूरी फोर्स सुरक्षित महसूस करती थी। मगर, इस समय ताशा सदमे में है। वह एकटक दरवाजे की ओर ताकती रहती है, जैसे वह अपने मास्टर विनोद शर्मा का इंतजार कर रही हो। दरअसल, 10 दिसंबर को बालाघाट से ड्यूटी कर लौट रहे मुरैना पुलिस के बम स्क्वॉड और डॉग स्क्वॉड की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया था। हादसे में ताशा के हैंडलर विनोद शर्मा सहित चार पुलिसकर्मियों की दर्दनाक मौत हो गई थी। जब हादसा हुआ तब ‘ताशा’ बस के पिछले हिस्से में बने अपने पिंजरे में सुरक्षित थी। उसे एक खरोंच तक नहीं आई, लेकिन उसने अपना सब कुछ खो दिया। 18 दिसंबर को ताशा का जन्मदिन है, और पिछले सात सालों में यह पहली बार होगा जब उसके जन्मदिन पर उसका मास्टर साथ नहीं होगा। आखिर कैसे इस हादसे ने ताशा की जिंदगी बदल दी। नए हैंडलर के साथ वो खुद को कैसे ढाल रही है। पढ़िए रिपोर्ट 40 दिन की उम्र से मौत तक का साथ
ताशा जब महज 40 दिन की थी, तब 18 दिसंबर 2018 को उसे 23वीं बटालियन एसएएफ में शामिल किया गया था। उसी दिन से उसकी जिम्मेदारी मास्टर विनोद शर्मा को सौंपी गई थी। श्वान मनोविज्ञान के अनुसार, डॉग के बच्चे अपनी मां के बाद जिस इंसान के संपर्क में सबसे ज्यादा रहते हैं, उसे ही अपना अभिभावक मान लेते हैं। ताशा ने आंखें खोलने के बाद से हर दिन, हर पल विनोद को ही देखा था। उसकी ट्रेनिंग, उसका खाना, खेलना और सोना, सब कुछ विनोद के साथ ही था। इसलिए विनोद का जाना उसके लिए सिर्फ एक हैंडलर का जाना नहीं, बल्कि अपने अभिभावक को खो देने जैसा है। खोई-खोई सी रहती है ताशा
ताशा को गौर से देखने पर समझ आता है कि जहां पुलिस के दूसरे डॉग्स एकदम एकाग्र और चौकन्ने रहते हैं, वहीं ताशा खोई-खोई रहती है। वह अपनी गर्दन और आंखों को बार-बार घुमाती है, मानो भीड़ में अपने मास्टर को ढूंढ रही हो या उनकी आवाज सुनने की कोशिश कर रही हो। वह उदास है, और धीरे-धीरे इस गहरे सदमे से उबरने की कोशिश कर रही है। वेटनरी डॉक्टर उमेश चौरसिया बताते हैं कि जब कोई डॉग अपने हैंडलर को खोता है, तो वह डिप्रेशन और ‘सेपरेशन एंग्जाइटी’ (बिछुड़ने का डर) का शिकार हो जाता है। इसका सबसे पहला असर उसकी भूख पर पड़ता है। ताशा ने भी हादसे के बाद से खाना-पीना बहुत कम कर दिया था। वह बार-बार उस कटोरे को सूंघती है, जिसमें विनोद उसे खाना खिलाते थे। मालिक-नौकर नहीं, दोस्ती और भरोसे का था रिश्ता
विनोद शर्मा के साथी बताते हैं कि उन दोनों का रिश्ता अद्भुत था। विनोद ताशा को अपनी बच्ची की तरह मानते थे। वह अक्सर कहते थे, ‘मैं अपने बच्चों से ज्यादा समय इसके साथ बिताता हूं। अपने बच्चों को नहलाए जमाना हो गया, लेकिन ताशा को रोज अपने हाथ से नहलाता हूं, उसकी मालिश करता हूं। शायद मैं उसे अपने बच्चे से भी ज्यादा समझता हूं।’ भिंड में उनके साथ काम कर चुके अजय बताते हैं, ‘जहां दूसरे हैंडलर डॉग को सिर्फ सुबह-शाम घुमाते हैं, वहीं विनोद जी ताशा को दिन में 8-10 बार बाहर निकालते थे। वह उसके लिए अपने पैसों से कैल्शियम की दवाइयां और नए-नए खिलौने लाते थे। बालाघाट से लौटते वक्त ताशा ने जो स्वेटर पहना था, वह भी बिल्कुल नया था, जिसे विनोद ने खास तौर पर ऑनलाइन मंगवाया था।’ ‘उसके दिमाग से यादें मिटाना एक चुनौती’
23वीं बटालियन के टीआई केसर सिंह, जो डॉग स्क्वॉड के प्रभारी हैं, बताते हैं, ‘ताशा 40 दिन की उम्र से एक ही हैंडलर के साथ थी। अब वह नहीं रहे, तो इसकी साइकोलॉजी पर गहरा असर पड़ना स्वाभाविक है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह उस हादसे की चश्मदीद है। उसके दिमाग से उन भयानक यादों को मिटाना हमारे लिए सबसे बड़ा काम है।’ उन्होंने बताया कि फिलहाल ताशा को कुछ दिनों के लिए किसी भी ऑपरेशनल काम से दूर रखा जाएगा। एक नए हैंडलर को सिर्फ इसी काम पर लगाया गया है कि वह ताशा के साथ खेले, उसका ध्यान रखे, उसकी साफ-सफाई करे और उसे पुरानी यादों से बाहर निकालने में मदद करे। कैसे बनते हैं पुलिस के जांबाज ‘सिपाही’?
एक आम कुत्ते से एक विशेषज्ञ पुलिस डॉग बनने का सफर 9 महीने की कठिन ट्रेनिंग से होकर गुजरता है। इसके चार चरण होते हैं… फैमिलाइजेशन(1 महीना): इसमें डॉग और हैंडलर के बीच दोस्ती का गहरा रिश्ता बनाया जाता है, ताकि वे एक-दूसरे की बॉडी लैंग्वेज समझ सकें। ओबीडियंस(3 महीने): इसमें डॉग को ‘सिट’, ‘डाउन’, ‘कम’ जैसे बुनियादी कमांड मानना सिखाया जाता है। नोज वर्क (4 महीने): यह सबसे अहम ट्रेनिंग है, जिसमें डॉग को सूंघने का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इसी के आधार पर उन्हें तीन ट्रेड में बांटा जाता है: अंतिम चरण: एक महीने के रिफ्रेशर कोर्स के बाद एक आईपीएस अधिकारी की अध्यक्षता वाली कमेटी डॉग का फाइनल टेस्ट लेती है। पास होने पर ही उसे जिले में तैनाती मिलती है। बटालियन मनाएगी ताशा का जन्मदिन
टीआई केसर सिंह बताते हैं, ‘हमारी बटालियन में जब भी किसी डॉग का जन्मदिन आता है, तो उसका हैंडलर उसे धूमधाम से मनाता है। 18 दिसंबर को ताशा का जन्मदिन है, लेकिन इस बार उसका हैंडलर साथ नहीं है। इसलिए हमने तय किया है कि हम सब मिलकर ताशा का जन्मदिन मनाएंगे। हम उसे यह महसूस नहीं होने देंगे कि उसके मास्टर नहीं हैं। हम सब ही अब ताशा का परिवार हैं।’ मध्यप्रदेश पुलिस डॉग स्क्वॉड में वर्तमान में कुल 208 डॉग्स हैं, जिनमें से 120 विभिन्न जिलों में सेवाएं दे रहे हैं। ये सिर्फ जानवर नहीं, बल्कि पुलिस बल के गुमनाम हीरो हैं, जो अपनी जान पर खेलकर अनगिनत जानें बचाते हैं। ताशा की कहानी भी इसी निस्वार्थ सेवा और अटूट वफादारी की एक मिसाल है, जो आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है।

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