मेरी बेटी की शादी नहीं हो रही थी। जहां भी रिश्ता लेकर जाते थे, लोग कहते थे तुम तो रेपिस्ट हो। इन 6 सालों में सब कुछ बदल गया। मेरी इज्जत, मेरा सम्मान, मेरा परिवार… सब बिखर गया। पत्नी डिप्रेशन में चली गई। यह सिर्फ मुझे नहीं, मेरे पूरे परिवार को सहना पड़ा है। यह कहते हुए भारत सिंह सिकरवार की आवाज में 6 साल का दर्द, अपमान और संघर्ष साफ झलकता है। 53 वर्षीय भारत सिंह, जो कभी एक सम्मानित खेल अधिकारी थे, पिछले 6 साल से एक नाबालिग खिलाड़ी से छेड़छाड़ के गंभीर आरोपों का बोझ ढो रहे थे। 5 दिसंबर, 2025 को भोपाल की विशेष (पॉक्सो) अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। इस दौरान भारत सिंह और उनके परिवार को बहुत कुछ सहन करना पड़ा। भास्कर ने भारत सिंह सिकरवार से बात कर जाना कि इन छह साल में उनका जीवन किस तरह से बदला? परिवार पर क्या असर पड़ा और वो किस मानसिक अवस्था से गुजरे। पढ़िए रिपोर्ट…. परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़, बिखर गई दुनिया
भारत सिंह बताते हैं कि इस आरोप का सबसे गहरा असर उनके परिवार पर पड़ा। वह कहते हैं, ‘मेरा एक बेटा 28 साल का है, दूसरा 26 का और बेटी 24 साल की है। तीनों बच्चे अविवाहित हैं। आप ही सोचिए, जिस पिता पर ऐसे घिनौने आरोप लगे हों, उसके घर कौन अपनी बेटी या बेटे की शादी करना चाहेगा?’ वह बताते हैं, ‘मेरी बेटी शादी के लायक है, लेकिन हर बार बात शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाती थी। मुझे लगता है, शायद मेरी बेटी भी कभी-कभी सोचती होगी कि क्या पापा ने सच में ऐसा कुछ किया होगा। एक पिता के लिए इससे बड़ा दर्द क्या हो सकता है? इस सदमे को उनकी पत्नी बर्दाश्त नहीं कर पाईं।’ भारत सिंह ने बताया, आरोप लगने के बाद मेरी पत्नी गहरे डिप्रेशन में चली गईं। आज भी उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती। इंसाफ की लड़ाई में बिक गई जमा-पूंजी
न्याय पाने की यह लड़ाई आर्थिक रूप से भी कमर तोड़ देने वाली थी। सिकरवार बताते हैं कि इन 6 सालों में वह 72 बार श्योपुर से भोपाल पेशी पर आए। हर पेशी का मतलब था सफर, वकीलों की फीस और अन्य खर्चे। उन्होंने हिसाब जोड़ते हुए कहा, ‘सिर्फ आने-जाने में ही मेरे करीब 1.5 लाख रुपए खर्च हो गए। जबलपुर हाईकोर्ट में वकील को 1.5 लाख रुपए दिए। जब पहली बार केस कोर्ट में लगा, तो भोपाल के वकीलों को 25 हजार दिए। इस केस को लड़ने के लिए वकील को 65 हजार और अपनी बहाली की प्रक्रिया के लिए 55 हजार रुपए अलग से दिए। कुल मिलाकर मेरे 6 लाख रुपए से ज्यादा इस लड़ाई में खर्च हो गए। समझौते के नाम पर मांगे 50 लाख
सिकरवार ने एक आरोप भी लगाया। उनके अनुसार, उन्हें मामले में राजीनामा करने के लिए 50 लाख रुपए की मांग का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा-मुझसे कहा गया कि अगर मैं राजीनामा कर लूं, तो 50 लाख रुपए देने पड़ेंगे। मैं एक शिक्षक हूं, इतने पैसे कहां से लाता? मुझ पर दबाव बनाया गया कि मैं अपनी बेटी की शादी के लिए रखा प्लॉट बेचकर पैसे दे दूं। सामाजिक बहिष्कार और अकेलापन
इस केस ने उन्हें सामाजिक रूप से भी अकेला कर दिया। सिकरवार एक यूट्यूब चैनल चलाते थे, जिस पर वह गांव-गांव जाकर दिए गए अपने प्रवचन अपलोड करते थे। यह उनका जुनून था, लेकिन केस के बाद यह सब बंद हो गया। वह कहते हैं, ‘लोग मुझे शक की नजर से देखने लगे थे। मिलना-जुलना कम हो गया। मैं रोज अखबारों में पढ़ता हूं कि झूठे केस के कारण लोग आत्महत्या कर लेते हैं। भगवान की कृपा है कि मैं जिंदा हूं, वर्ना मैं भी डिप्रेशन में जाकर कुछ भी कर सकता था। हर आदमी इतनी बड़ी लड़ाई नहीं लड़ सकता। सिकरवार बोले- कुछ लोग फंसाना चाहते हैं
कोर्ट से बरी होने के बावजूद भारत सिंह की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। वह पिछले चार साल से निलंबित हैं और उनका करीब 25 लाख रुपए का वेतन रुका हुआ है। उनका कहना है, ‘अगर मुझे सजा हो जाती, तो न तो यह वेतन मिलता और न ही पेंशन। मेरी नौकरी में अभी नौ साल बाकी हैं। हमारे देश में पुरुष होना ही जैसे एक गुनाह है। उन्हें यह भी आशंका है कि विभाग के कुछ लोग, जो उन्हें फंसाना चाहते थे, इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। भारत सिंह सिर्फ इतना कहते हैं, मेरा तो बस यही कहना है कि जो मेरे साथ हुआ, वह किसी के साथ न हो, मेरे दुश्मन के साथ भी नहीं। मैं किसी को दोष नहीं देता। भगवान पर मेरा अटूट विश्वास है, उसी ने मुझे गलत होने से बचाया, वर्ना मैं भी उन हजारों लोगों की तरह मर जाता, जो झूठे आरोपों का सामना नहीं कर पाते।


