ये अंधेरगर्दी किसी को ‘दिखाई’ नहीं दे रही…:स्कूल ऑफ आई में ढाई गुना तक ज्यादा वेतन लेकर भी आम डॉक्टरों की तरह काम कर रहे मेडिकल टीचर्स

स्कूल ऑफ एक्सीलेंस फॉर आई में नियुक्त प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर की सैलरी क्रमशः तीन, ढाई और डेढ़ लाख रुपए महीना है। पदस्थ टीचिंग स्टाफ को सालाना 8% वेतनवृद्धि, 10% हाउस रेंट अलाउंस और सर्जरी के लिए भर्ती मरीजों के इलाज के बदले 20 फीसदी तक इंसेंटिव भी अलग से मिलता है। इसी तरह प्रोफेसर को करीब 4.5 लाख, एसो. प्रोफेसर को करीब 4 लाख और असिस्टेंट प्रोफेसर को 3 लाख प्रतिमाह तक राशि मिल जाती है। पीजी सीटें नहीं होने के कारण ये लोग सामान्य सरकारी डॉक्टर्स की तरह सिर्फ इलाज कर रहे हैं। आम सरकारी डॉक्टरों की सैलरी 75 हजार से 1.25 लाख तक ही होती है। सवाल ये है कि इसे शैक्षणिक संस्थान के रूप में स्थापित करने की योजना थी तो सीटें आवंटित करने में लापरवाही क्यों बरती गई? ये जमीनी हकीकत- 8 करोड़ की लेसिक मशीन लेकिन जरूरी सामान ही नहीं जुलाई 2025 में डॉ. शरदीनी व्यास ने अस्पताल छोड़ दिया था। इसके बाद से करीब 8 करोड़ की लेसिक मशीन (चश्मा उतारने का ऑपरेशन) का उपयोग कभी-कभी ही होता है। सूत्रों के अनुसार, इस मशीन के संचालन के लिए कंज्यूमेबल प्रोडक्ट एमजीएम प्रबंधन की तरफ से समय पर नहीं मिलते हैं। इस कारण मशीन का उपयोग ही नहीं हो पाता है। अगर पीजी सीटें मिलतीं तो इन मशीनों का उपयोग पढ़ाई के लिए होता। अस्पताल में करीब 20 करोड़ की लागत से एडवांस मशीनें लगाई गई हैं, जिनका उपयोग भी सिर्फ इलाज के लिए ही हो रहा है। नियुक्तियां भी सवालों के घेरे में डॉ. मीता जोशी, डॉ. टीना अग्रवाल, डॉ. ऋषि गुप्ता और डॉ. प्रतीप व्यास, डॉ. शरदीनी व्यास की नियुक्ति को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। इनमें डॉ. प्रतीप और शरदीनी नौकरी छोड़ चुके हैं। विभागीय जांच में सभी नियुक्तियों को नियम संगत बताकर क्लोजर रिपोर्ट लगा दी गई है। अथवा शब्द जोड़ने से उलझे
ग्वालियर में मानसिक आरोग्यशाला सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और जबलपुर स्थित स्कूल ऑफ एक्सीलेंस इन पल्मोनरी मेडिसिन में सभी प्रोफेसर, एसो. प्रोफेसर, असि. प्रोफेसर की नियुक्ति में एमसीआई के मापदंडों का पालन हुआ। इसलिए पीजी की सीटें आसानी से अलॉट हो गईं। शिकायतकर्ता का कहना है कि इंदौर के स्कूल ऑफ आई में मापदंडों की अनदेखी की गई। कुछ लोगों को लाभ पहुंचाने नियमों में अथवा जोड़कर चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। इस कारण नियुक्तियों को चुनौती दी गई है। सीधी बात – तरुण राठी, कमिश्नर हेल्थ पीजी सीटों के लिए फिर कोशिश करेंगे पीजी सीटें नहीं हैं तो भर्ती टीचिंग फैकल्टी की क्यों की?
– सेंटर फॉर आई इलाज और शिक्षण दोनों के लिए बना है। ये केवल शिक्षण संस्थान नहीं है। उस समय सीटें क्यों नहीं मिली, इसे दिखवाते हैं। पीजी सीटों के लिए फिर से कोशिश करेंगे।
टीचिंग फैकल्टी की सैलरी सामान्य डॉक्टर से ज्यादा है?
– इनका अपॉइंटमेंट बेहतर इलाज और शिक्षण दोनों का है। उच्च स्तरीय सर्जरी और शिक्षा दोनों ही उद्देश्य है। हर संस्थान में सैलरी अलग-अलग होती है।
8 करोड़ की लेसिक मशीन के लिए डॉक्टर ही नहीं है?
– इस मामले को दिखवा लेंगे। किसी डॉक्टर को इसकी ट्रेनिंग दिलवाकर उसका उपयोग कराना सुनिश्चित करेंगे।
नियुक्ति को लेकर मामला कोर्ट में पेंडिंग है?
– जो मामला कोर्ट में है, उस पर कुछ कहना सही नहीं है। कोर्ट में ही उसका विधिवत जवाब देंगे।

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