राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने कैनरा बैंक के एक पूर्व कर्मचारी द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि नीलामी की बिक्री सूचना प्रकाशित होने के बाद उधारकर्ता का संपत्ति पर रिडेम्पशन (छुड़ाने) का अधिकार समाप्त हो जाता है। जस्टिस डॉ. नुपूर भाटी की एकल पीठ ने कहा- संशोधित सरफेसी (SARFAESI) एक्ट और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद इस मामले में कोई हस्तक्षेप संभव नहीं है। श्रीगंगानगर निवासी लकी गर्ग की याचिका पर 28 नवंबर को दिए आदेश में पीठ ने कहा कि नोटिस जारी होने के बाद संपत्ति के हस्तांतरण या नीलामी को नहीं रोका जा सकता। भले ही कर्जदार बकाया चुकाने को तैयार हो। पहले नौकरी से बर्खास्त, फिर लोन डिफॉल्ट
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता लकी गर्ग सिंडिकेट बैंक (अब केनरा बैंक) में असिस्टेंट मैनेजर थे। उन्होंने वर्ष 2014 में 24 लाख रुपए का होम लोन लिया था। 9 अक्टूबर 2024 को कदाचार के आरोपों के चलते उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। नौकरी जाने के बाद वह लोन की किस्तें नहीं चुका पाए और बैंक ने उनका खाता एनपीए घोषित कर दिया। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में बताया कि बैंक ने 21 दिसंबर 2024 को करीब 17.93 लाख रुपए बकाया का नोटिस भेजा। याचिकाकर्ता ने बैंक से अनुरोध किया कि उसकी ग्रेच्युटी, लीव इनकैशमेंट और एनपीएस (NPS) में जमा करीब 19.59 लाख रुपए से लोन की भरपाई कर ली जाए। लोन चुकता नहीं हुआ, तो सेल नोटिस जारी
बैंक ने 16 जनवरी 2025 को पत्र भेजकर बकाया देनदारी का हवाला देते हुए NPS क्लेम आईडी जनरेट करने से इनकार कर दिया। इसके बाद 10 नवंबर 2025 को कैनरा बैंक ने पदमपुर स्थित 1249.92 वर्गफुट के मकान की नीलामी की सेल नोटिस जारी की। इसमें 18.45 लाख रुपए से अधिक की वसूली के लिए 29 नवंबर 2025 को ऑक्शन तय किया गया। इस बिक्री अधिसूचना (सेल नोटिस) को चुनौती देते हुए याचिका में मांग की गई थी कि श्रीगंगानगर जिले के पदमपुर स्थित उनके आवासीय मकान की नीलामी पर रोक लगाई जाए। साथ ही उनकी ग्रेच्युटी, लीव इनकैशमेंट और NPS आदि सेवा लाभ जारी कर बैंक लोन की समायोजन की अनुमति दी जाए। बैंक का तर्क: सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू
केनरा बैंक की ओर से पैरवी करते हुए लॉ ऑफिसर ऋतिका अग्रवाल ने याचिका का विरोध किया। बैंक की वकील ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही ‘एम. राजेंद्रन व अन्य बनाम मेसर्स केपीके ऑयल्स’ के मामले में स्पष्ट फैसला दिया है। इस फैसले के अनुसार जिस दिन बैंक नीलामी का नोटिस प्रकाशित कर देता है। उसी दिन कर्जदार का संपत्ति को रिडीम करने (वापस पाने) का अधिकार समाप्त हो जाता है। इसलिए अब याचिकाकर्ता के पास कोई अधिकार शेष नहीं है। कोर्ट ने कहा: नोटिस प्रकाशन होने के बाद अधिकार खत्म
जस्टिस डॉ. नुपूर भाटी ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद सरफेसी एक्ट की संशोधित धारा 13(8) का विस्तृत उल्लेख करते हुए कहा- यह प्रावधान साफ तौर पर कहता है कि यदि कर्जदार पूरी बकाया राशि (खर्च और चार्ज सहित) नीलामी की पब्लिक नोटिस छपने की तारीख से पहले जमा करता है तो ही संपत्ति की ट्रांसफर प्रक्रिया रोकी जाएगी। एक बार नीलामी की सार्वजनिक सूचना प्रकाशित हो जाने के बाद रिडेम्पशन का अधिकार खत्म हो जाता है। इसके बाद अदालतें भी उस अधिकार को पुनर्जीवित नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने पाया कि बैंक ने 10 नवंबर को नोटिस जारी कर दिया था, इसलिए अब नीलामी प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई जा सकती। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। क्या है ‘Right of Redemption’?
संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) के तहत किसी भी कर्जदार के पास यह अधिकार होता है कि वह अपनी गिरवी रखी संपत्ति को लोन की राशि चुकाकर बैंक से वापस ले सकता है। इसे ‘राइट ऑफ रिडेम्पशन’ कहते हैं। हालांकि सरफेसी एक्ट में संशोधन और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने अब यह तय कर दिया है कि यह अधिकार केवल ‘नीलामी का सार्वजनिक नोटिस’ (Public Auction Notice) जारी होने की तारीख तक ही जीवित रहता है।


