ठेका लेना और काम कराना आसान नहीं होता। जब सरकार का इकबाल बुलंद होने की जगह उसपर सवाल उठने लगें तो समस्या और बढ़ जाती है। बीकानेर के कुछ मामलों की बात करें तो ऐसा ही हो रहा है। ब्यूरोक्रेसी इतनी हावी है कि सीएम की घोषणा में भी कदम कदम पर रोड़े अटकाए जा रहे हैं। 2024 में सीएम ने अपने पहले बजट में बीकानेर ड्रेनेज प्रोजेक्ट के लिए जो राशि मंजूर की थी पहले उसे वित्त विभाग ने काट दिया। 23 महीने बाद भी वित्त विभाग कागजी कार्रवाई पूरी नहीं कर पा रहा। वह भी तब जब बीकानेर निगम आयुक्त आईएएस मयंक मनीष भी यूडीएच से लेकर वित्त विभाग के दो चक्कर लगाकर आ गए। दरअसल फरवरी 2024 के बजट में सीएम भजनलाल शर्मा ने बीकानेर में ड्रेनेज प्रोजेक्ट के लिए 100 करोड़ रुपए मंजूर किए थे। निगम ने हाथों हाथ 100 करोड़ की डीपीआर बनाकर भेज दी। वित्त विभाग ने सैद्धांतिक स्वीकृति देते वक्त ही इसमें से 41 करोड़ की कटौती करते हुए 59 करोड़ करोड़ मंजूर किए। इसके बाद निगम ने इसका टेंडर बनाकर भेजा। इसमें वल्लभगार्डन में एकत्र होने वाले गंदे पानी की निकासी, खुदखुदा नाला समेत चार काम हाथ में लिए। टेंडर लगा दिया। जब वर्कऑर्डर की बात आई तो जयपुर से कहा गया कि टेंडर की फाइल यहां भेजें। वर्कआर्डर यहीं से जारी होगा। 3 महीने से वर्कऑर्डर नहीं हो पाया क्योंकि वित्त विभाग वित्तीय मंजूरी नहीं दे रहा। वित्त मंत्री दिया कुमारी हैं। इस फाइल के अटकने के पीछे सत्ता से जुड़े गुटों का आपसी संघर्ष भी माना जा रहा है। इन सबसे बड़ा नुकसान बीकानेर की उन चार कॉलोनियों पर है जो ड्रेनेज ना होने से हर साल करीब चार से पांच बार डूबती हैं। वल्लभगार्डन की पॉल साल में कभी भी पानी का ज्यादा दबाव होने पर डूब जाती हैं। इसी प्रोजेक्ट की उम्मीद से रुका है पलायन, वर्ना घर बेच देते वल्लभगार्डन की अब तक की सबसे बड़ी 300 फीट चौड़ी पाल बीती बारिश में टूटी थी। इससे पहले जब भी टूटी तो 20 से 50 और अधिकतम 70 फीट तक टूटी थी मगर बीते मानसून में 61 एमएम बारिश का पानी सहन नहीं हो सका और पाल दरक गई। नतीजा,बजरंग विहार प्रथम व सेकंड फेज और मदन विहारसमेत 4 कॉलोनियों का का पूरा इलाका जलमग्न हो गया। ये चारों कॉलोनियों मानो पानी के टापू पर बसी लगती हैं। बीते दो तीन सालों में वल्लभगार्डन की पाल अब तक कितनी बार टूट चुकी। इसकी गिनती तो शायद वल्लभगार्डन के लोग भी भूल चुके होंगे। जमीन या मकान ले लिया वर्षों से रह रहे हैं तो सबकुछ छोड़कर भाग नहीं सकते। एक उम्मीद ड्रेनेज प्रोजेक्ट ने जगाई है और इसीलिए लोग यहां से पलायन नहीं करना चाहते। अगर सरकार ये आस ना बंधाती तो अब तक लोग ये इलाका छोड़कर जा चुके होते क्योंकि यहां कई कई दिनों तक लोग जलकैद में रहते हैं। हर बार रेस्क्यू कराना पड़ता है। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। लोग अब भी उम्मीद कर रहे हैं कि शायद ड्रेनेज बनने के बाद पानी ना आए और चैन की जिंदगी जी सकें वरना हर पल पाल टूटने का डर यहां के करीब 20 हजार से ज्यादा लोगों के मन में समाया रहता है।


