सिटी रिपोर्टर | बिलासपुर जिले की बालवाड़ी योजना की असलियत सामने आते ही प्रशासन की नींद उड़ गई। स्कूल खुले महीनों बीत गए, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी बालवाड़ियों का नियमित निरीक्षण करने की जरूरत तक नहीं समझ रहे थे। बच्चों की उपस्थिति के लिए प्रभारियों द्वारा दिए गए कागजी आंकड़ों को ही पूरा सच मान लिया जा रहा था। 4 दिसंबर को दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबर ने पूरे मामले की सच्चाई उजागर कर दी, जिसके बाद कलेक्टर संजय अग्रवाल ने डीईओ विजय टांडे और डीएमसी ओम पांडे को तत्काल तलब कर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने दोनों अधिकारियों को आदेश दिया गया कि वे स्वयं मौके पर जाकर बच्चों की कागजी उपस्थिति देखें। इस संबंध में सोमवार को शिक्षा विभाग और आंगनबाड़ी केंद्रों की सहायिकाओं के साथ अहम बैठक प्रस्तावित है। इसमें बच्चों की लगातार घटती उपस्थिति और उसके समाधान पर चर्चा होगी। खबर प्रकाशित होने के बाद समग्र शिक्षा विभाग के अधिकारी विभिन्न स्कूलों में पहुंचे, लेकिन अधिकांश स्कूलों में बालवाड़ी के बच्चे दिखाई ही नहीं दिए। वहीं, सोमवार को शिक्षा विभाग और आंगनबाड़ी केंद्रों की सहायिकाओं के साथ एक अहम बैठक प्रस्तावित है। इस बैठक में बच्चों की लगातार कम होती उपस्थिति और इसके समाधान पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। खबर प्रकाशित होने के बाद समग्र शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारी विभिन्न स्कूलों में निरीक्षण के लिए पहुँचे, लेकिन अधिकांश स्कूलों में बालवाड़ी के बच्चे मौजूद नहीं मिले। जांच के निर्देश दिए गए, योजना पर बारीकी से चर्चा करेंगे ^ बालवाड़ियों की जांच के निर्देश दिए गए हैं। योजना पर जल्द ही बारीकी से चर्चा की जाएगी। -संजय अग्रवाल, कलेक्टर जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार ने वर्ष 2022 में 5 से 6 वर्ष के बच्चों में खेल-खेल में सीखने की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से बालवाड़ी योजना शुरू की थी। योजना में प्रत्येक स्कूल के प्रभारी को प्रतिमाह 500 रुपए मानदेय मिलता है। दैनिक भास्कर की टीम ने जिले के 53 स्कूलों का सर्वे किया तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। रजिस्टर में दर्ज बच्चों के नाम और वास्तविक कक्षाओं में बच्चों की संख्या में जमीन-आसमान का फर्क था। पूरे जिले में केवल 13 बच्चे बालवाड़ी में उपस्थित पाए गए। स्थिति सिर्फ जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में हालात चिंताजनक हैं। पिछले तीन वर्षों में बालवाड़ी में दर्ज बच्चों की संख्या लगभग 80 प्रतिशत तक कम हो गई है। तीन वर्ष पहले जहां 17 हजार से अधिक बच्चे नामांकित थे, वहीं अब मात्र 1,900 बच्चे ही आ रहे हैं। प्रदेश के चार जिलों का हाल तो इतना खराब है कि वहां बालवाड़ी में बच्चों की उपस्थिति लगभग शून्य बताई जा रही है। कलेक्टर संजय अग्रवाल ने बालवाड़ियों की गहन जांच के निर्देश दे दिए हैं और जल्द ही पूरी योजना की बारीकी से समीक्षा कर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।


