याददाश्त खोकर परिवार से बिछड़ चुके बुजुर्गों को नई पहचान दिलाने का मिशन राजधानी में उम्मीद की किरण बन गया है। पुलिस, समाजसेवी और स्वयंसेवी संस्थाओं की इस संयुक्त पहल का एक मार्मिक उदाहरण हाल ही में तब सामने आया, जब एक सोशल मीडिया पोस्ट ने 42 साल पुराने बिछड़े रिश्ते को फिर जोड़ दिया। बैतूल निवासी राज सिंह को जीवन का सबसे बड़ा सुख तब मिला, जब उन्हें पता चला कि उनके पिता पूरन सिंह धुर्वे जीवित हैं और भोपाल के आसरा वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। परिवार ने उन्हें चार दशक पहले मृत मान लिया था। डीएसपी संतोष पटेल अपनी पत्नी का जन्मदिन मनाने वृद्धाश्रम पहुंचे थे। बातचीत में एक बुजुर्ग ने खुद को पूर्व सब-इंस्पेक्टर बताया। आश्रम प्रबंधन ने उनका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा किया। यही वीडियो बैतूल के सामाजिक कार्यकर्ता रवि त्रिपाठी की नजर में आया और उन्होंने इसकी जांच शुरू की। इसके बाद रवि ने बैतूल के बुजुर्गों से संपर्क कर बुजुर्ग की पहचान कराना शुरू की। इसी दौरान फुटबॉलर इकबाल भाई ने बताया कि यह व्यक्ति पूरन सिंह धुर्वे हैं, जो टेमनी गांव के रहने वाले हैं। गांव के प्रेम वर्मा और सेवानिवृत्त एसआई जॉनसन हेराल्ड ने भी इसकी पुष्टि की। कैसे हुई बुजुर्ग की पहचान
भोपाल की स्वयंसेवी संस्था लक्ष्मी नारायण आनंदम क्लब के सचिव मोहन सोनी बताते हैं कि 8 महीने पहले यह बुजुर्ग अस्थिर मानसिक स्थिति में आश्रम के गेट पर छोड़े गए थे। इलाज के बाद उनकी तबीयत सुधरी तो वे ग्वालियर, सागर और भिंड में बतौर पुलिस अधिकारी काम करने की बातें याद करने लगे। इसी से आगे की कड़ी जुड़ती गई। पत्नी के मौत के बाद बिगड़ी मानसिक स्थिति… बातचीत से पता चला कि 42 साल पहले भोपाल में सरकारी काम के दौरान पत्नी की हादसे में मौत के बाद उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ी और वे घर का रास्ता भूल गए। कई साल भोपाल के आसपास एक परिवार के खेतों पर रहे। बाद में खेत मालिक की मृत्यु पर उसके बेटे ने उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ दिया। कभी सोचा नहीं था कि पिताजी मिलेंगे… राज ने बताया कि जब पिताजी लापता हुए तब उनकी उम्र डेढ़ साल थी। पिता के जीवित होने की जानकारी मिलते ही वे तुरंत भोपाल पहुंचे। पिता-पुत्र का मिलन देख आश्रम में मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो गया। राज ने कहा- कभी सोचा नहीं था कि पिताजी फिर मिलेंगे। दूसरे राज्यों के 65 बुजुर्गों को भी घर पहुंचाया
लक्ष्मी नारायण आनंदम क्लब पुलिस के साथ मिलकर उन बुजुर्गों की पहचान में जुटा है, जो याददाश्त खोकर शहर की सड़कों पर भटकते मिलते हैं। सचिव मोहन सोनी के अनुसार, जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 के बीच संस्था 200 बुजुर्गों को उनके घर पहुंचा चुकी है। इनमें 65 बुजुर्ग दूसरे राज्यों से भोपाल भटककर आए थे और 25 वे थे जिनकी गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज थी। अधिकांश अल्जाइमर से पीड़ित थे।


