मप्र के सबसे चर्चित व्यापमं घोटाले की जांच कर रही सीबीआई की जांच ही सवालों में घिर गई है। सीबीआई ने घोटाले के आरोपियों की पहचान करने के लिए एक दृष्टिबाधित को समन जारी कर दिया है। दृष्टिबाधित युवक का नाम हीरालाल बघेल है। वह इस समय मंत्रालय में एलडीसी के पद पर काम कर रहा है। खास बात ये भी है कि सीबीआई ने जिस पीएमटी 2009 की जांच लिए ये समन जारी किया है उस समय हीरालाल की उम्र 15 साल थी और वह स्कूल में पढ़ता था। युवक ने सीबीआई दफ्तर जाकर अफसरों को शिकायत की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला है। क्या है ये मामला, जानने के लिए पढ़िए ये रिपोर्ट… अब जानिए कैसे मिला नोटिस कुक्षी में सीबीआई को हीरालाल की तलाश
हीरालाल उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, ‘मेरे पास 4 दिसंबर को कुक्षी तहसील कार्यालय से फोन आया कि आपके नाम से एक जरूरी नोटिस है। जब मैंने नोटिस पढ़वाया, तो मेरे होश उड़ गए। नोटिस में लिखा था कि 2009 के पीएमटी घोटाले के संबंध में उन्हें गवाही देने के लिए 24 दिसंबर को ग्वालियर की विशेष सीबीआई अदालत के सामने पेश होना है। नोटिस में ये भी लिखा कि यदि गवाही देने नहीं पहुंचे, तो गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा सकता है। नोटिस में सिर्फ हीरालाल बघेल लिखा है। इसमें न तो पिता के नाम का जिक्र है और न ही पता लिखा है। उम्र की जगह लिखा है शून्य। यानी नोटिस आधा-अधूरा है। हीरालाल का कहना है कि नोटिस मिलने के बाद मैं भोपाल के चार इमली स्थित CBI के दफ्तर पहुंचा, तो मुझे कहा गया कि प्रोफेसर कॉलोनी वाले दफ्तर जाओ। ‘2009 में तो मैं स्कूल में था, पीएमटी के बारे में पता नहीं’
हीरालाल अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहते हैं, ‘मैं जन्म से देख नहीं सकता, यह तो एक बात है ही, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि 2009 में मैं सिर्फ 15 साल का था और अपने गांव के सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा में पढ़ता था। मैंने तो तब पीएमटी का नाम भी नहीं सुना था। मैं भला उस घोटाले की शिकायत क्यों और कैसे करता? इस एक नोटिस ने उन्हें और उनके परिवार को मानसिक रूप से तोड़ दिया है। वह कहते हैं, ‘मैं गिरफ्तारी के डर से रात को सो नहीं पा रहा हूं। मैंने अपनी पूरी जिंदगी सम्मान से जीने की कोशिश की है, और आज मुझ पर एक ऐसे मामले में शामिल होने का दबाव है, जिससे मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं।’ क्या है 2009 का वह केस, जिसमें हीरालाल को बनाया गवाह?
जिस मामले में हीरालाल बघेल को गवाह बनाया गया है, वह 2009 में ग्वालियर में हुई प्री-मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) परीक्षा से जुड़ा है। आरोप है कि ग्वालियर के शासकीय पद्माराजा कन्या उच्चतम माध्यमिक विद्यालय और केआरजी कॉलेज में बने परीक्षा केंद्रों पर असली परीक्षार्थियों की जगह सॉल्वर्स को बैठाया गया था। इन सॉल्वर्स ने फर्जी दस्तावेज के सहारे परीक्षा दी और अयोग्य छात्रों को व्यापमं के माध्यम से चयनित करवाया। इस मामले में मध्य प्रदेश पुलिस ने 19 लोगों को आरोपी बनाया था। 2016 में यह केस CBI को ट्रांसफर कर दिया गया था, और अब 9 साल बाद CBI इस केस में गवाहों को बुला रही है। सीबीआई की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
इस मामले के सामने आने के बाद व्यापमं घोटाले की जांच कर रही सीबीआई की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। हीरालाल का सवाल है कि किसी व्यक्ति को गवाह के रूप में समन भेजने से पहले CBI जैसी प्रतिष्ठित एजेंसी क्या वेरिफिकेशन नहीं करती? क्या नोटिस जारी करने से पहले यह देखना जरूरी नहीं था कि जिस व्यक्ति को गवाही के लिए बुलाया जा रहा है, क्या वह शारीरिक और परिस्थितिजन्य रूप से गवाही देने में सक्षम है भी या नहीं? भास्कर ने इस मामले में सीबीआई के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।


