रेव्ह. आशिषन कण्डुलना, एचआरडीसी, जीईएल चर्च रांची| येसु अपने सेवा कार्य को शुरू करने के पहले नासरत की आराधनालय में गए। वहां पर उन्होंने अपने अग्रिम सेवा कार्य की घोषणा इस प्रकार से की – ‘प्रभु का आत्मा मुझ पर है, कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिए मेरा अभिषेक किया है, बंदियों को छुटकारे का और अंधों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करुं और कुचले हुवों को छुड़ाऊं (लूक 4:18)।’ येसु के इस घोषणा को गौर करते हैं तो हम पाते हैं कि येसु का इस दुनिया में आने का क्या उद्देश्य था। येसु का जीवन और कार्य निचले तबके के लोगों और समाज के हाशिये पर रह रहे लोगों के लिए था। जिनका समाज में शोषण होता था उनको बचाने और उनको राह दिखाने के लिए आए थे। येसु ने अपनी सेवा कार्य के दौरान कई बहरों, अंधों, अपाहिजों, गूंगों को स्वस्थ्य किया। उसी तरह कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों को स्वस्थ्य करके उनको समाज की मुख्य धारा में शामिल लिया। कई बार येसु ने भूखे लोगों को खिलाया और खिलाने की आज्ञा भी चेलों को दी। इस तरह येसु ने गरीब, लाचार, असहाय लोगों को मदद करने और उनके उत्थान के लिए महान कार्य किया। इन कार्यों को करने के लिए येसु ने अपने आपको नम्र किया। येसु लोगों से सेवा कराने नहीं पर सेवा देने आए थे(मरकुस 10:45)। इस आगमन काल में हम क्रिसमस की ओर बढ़ रहे हैं, इस समय येसु के जीवन और कार्यों का अनुसरण करें। नम्रता का धारण करें और दीन दुखियों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहें। येसु का उपदेश है कि-‘जैसा मैंने तुमसे प्रेम रखा वैसे ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो (यूहन्ना 15:12) ।’ प्रेम से बढ़ कर कोई आज्ञा नहीं है। हमारे मन में ईश्वर और मनुष्य के प्रति प्रेम है तो आप बड़ा से बड़ा सेवा का काम नि:स्वार्थ भाव से करेंगे।


