जोधपुर हाई कोर्ट ने गलत पैथोलॉजी रिपोर्ट और जाली हस्ताक्षर के आरोपों से डॉक्टर दंपती को दोषमुक्त करते हुए लोअर कोर्ट के संज्ञान पर टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने कहा- चिकित्सा और कानूनी मामलों में प्रतिष्ठा के साथ जनता का विश्वास भी शामिल है। ऐसे में, अपरिपक्व अनुमानों के आधार पर संज्ञान लेने से डॉक्टर का पेशा कलंकित होता है। इसलिए, न्यायालयों को संयमित होना चाहिए और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के दुरुपयोग को रोकने का काम करना चाहिए। साथ ही, कानून और चिकित्सा के क्षेत्र में जनता का विश्वास मजबूत करने के लिए विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही आगे बढ़ना चाहिए। जाली हस्ताक्षर होने का दावा किया था हॉस्पिटल की ओर से हाईकोर्ट में महेश थानवी और निशांत बोड़ा ने पक्ष रखा था। उन्होंने बताया- मामला 2007 का था, जोधपुर के नंदलाल व्यास की ओर गोयल अस्पताल और इसके डायरेक्टर डॉ. आनंद गोयल और डॉ. सुभाषिणी गोयल पर केस दर्ज करवाया था। उनके जीजा प्रकाश नारायण पुरोहित को एस्कॉर्ट्स गोयल हार्ट सेंटर जोधपुर में 2006 में भर्ती कराया गया था। उपचार के दौरान 13 अक्टूबर 2006 को प्रकाश नारायण पुरोहित की मौत हो गई थी। पूरे मामले में हॉस्पिटल में की गई जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए पैथोलॉजिस्ट के हस्ताक्षर जाली होने का दावा किया गया था। जबकि, हॉस्पिटल के पैथोलॉजिस्ट ने स्वयं अपने हस्ताक्षर होने की पुष्टि की थी। मेडिकल काउंसिल ने भी अपनी जांच में प्रकाश नारायण पुरोहित के उपचार में कोई खामी नहीं होना बताया। केवल अनुमान लगाने को लेकर हाईकोर्ट ने अनुचित माना और डॉक्टर्स को दोषमुक्त करार दिया है। 2013 में की थी हाईकोर्ट में अपील बोड़ा ने बताया- नंदलाल व्यास ने 17 अगस्त 2007 को सिविल जज जोधपुर के समक्ष परिवाद पेश किया था। इसमें बताया गया कि परिवादी के बहनोई प्रकाश नारायण पुरोहित को जोधपुर के एस्कॉर्ट गोयल हार्ट सेंटर में 3 अक्टूबर 2006 को भर्ती किया गया था। इसके बाद 2013 में जोधपुर की मेट्रोपॉलिटन एडिशनल सेशन जज संख्या 2 ने 19 जनवरी 2013 को संज्ञान लेते हुए डॉक्टर दंपती पर क्रिमिनल ट्रायल कराने के आदेश दिए थे। इस ट्रायल को लेकर डॉक्टर दंपती की और से हाईकोर्ट में अपील की गई। हाईकोर्ट ने कहा- अनुमान के आधार पर फैसलों से बचे मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट जस्टिस फरजंद अली ने फैसले में कहा- मेडिको-लीगल मामलों में, जहां अक्सर दांव पर सिर्फ प्रतिष्ठा ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों में सार्वजनिक विश्वास भी शामिल होता है। वहां अनुमानात्मक तर्क बहुत ज्यादा होते हैं। न्यायालयों को ऐसे मामलों में सामान्य अनुमान के सिद्धांत को लागू करने से बचना चाहिए। जब तक कि आरोपों को पुष्ट करने के लिए स्पष्ट, वैज्ञानिक और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत पेश न किए जाएं। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि डॉक्टरों/अस्पताल प्रशासन से संबंधित मामलों में फर्जी पैथोलॉजिकल रिपोर्ट के आरोपों में संज्ञान लेने से पहले सावधानीपूर्वक न्यायिक जांच की आवश्यकता होती है।


