भास्कर न्यूज | जांजगीर ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय प्रवचन शृंखला के 14वें दिन पूज्य स्वामी श्री युगल शरण जी महाराज ने कर्म मार्ग, विकर्म, कर्मयोग और कर्मसंन्यास पर गूढ़ व शास्त्रसम्मत व्याख्या प्रस्तुत की। प्रवचन में उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल कर्म-धर्म के सहारे जीव अपने परम लक्ष्य भगवत् प्राप्ति तक नहीं पहुंच सकता। स्वामी जी ने मुण्डकोपनिषद् के प्रसिद्ध श्लोक “परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्रा ह्मणो निर्वेदमायात्” का उल्लेख करते हुए कहा कि आध्यात्मिक वैज्ञानिकों ने केवल कर्म करके यह अनुभव किया कि कर्म से मुक्ति नहीं होती, बल्कि स्वर्ग की प्राप्ति होती है। स्वर्ग भी स्थायी नहीं है, क्योंकि पुण्य क्षीण होने के बाद जीव को पुनः संसार चक्र में लौटना पड़ता है। उन्होंने “प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा” का संदर्भ देते हुए कहा कि कर्म-धर्म एक अस्थिर नाव के समान है, जिसके सहारे माया से पार नहीं पाया जा सकता। उन्होंने बताया कि संसार में अनेक प्रकार के मार्ग प्रचलित हैं। वेद-वाणी के आधार पर कर्मों को निषिद्ध कर्म, सात्त्विक (वैदिक) कर्म और नित्य कर्म आदि में विभाजित किया गया है। निषिद्ध कर्म जैसे झूठ, अत्याचार, भ्रष्टाचार, चोरी और पापाचार सभी के लिए वर्जित हैं। सात्त्विक कर्म को ही धर्म या पुण्य कर्म कहा जाता है, जिसका पालन श्रुति-स्मृति के अनुसार सभी को करना होता है। कर्मकांड की व्याख्या करते हुए स्वामी जी ने नित्य, नैमित्तिक, काम्य और प्रायश्चित—इन चार प्रकार के कर्मों को विस्तार से समझाया। नित्य कर्म का फल नहीं मिलता, किंतु न करने पर दंड का विधान है। नैमित्तिक कर्म विशेष परिस्थितियों में किए जाते हैं, जैसे जन्म या मृत्यु के अवसर पर। काम्य कर्म इच्छा पूर्ति के लिए होते हैं और प्रायश्चित कर्म अनजाने में हुए पापों से मुक्ति के लिए बताए गए हैं। उन्होंने कहा कि कर्मकांड में विधि और निषेध के अत्यंत कठोर नियम हैं और इसके लिए देश, काल, द्रव्य, कर्ता, मंत्र और विधि—इन छहों की शुद्धता आवश्यक है। कलियुग में इन सभी का सही-सही पालन करना लगभग असंभव है। नियमपूर्वक पालन करने पर भी इसका फल केवल स्वर्ग है, जहां माया नहीं होती। स्वर्ग लोक की चर्चा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि वहां मृत्युलोक से हजारों गुना अधिक भौतिक सुख मिलता है, किंतु वह भी भोग्य और नाशवान है। पुण्य समाप्त होने पर जीव को नीच योनियों में जाना पड़ता है। इसी कारण श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म-धर्म के जाल में न फंसने की शिक्षा देते हुए गीता में “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” कहा। प्रवचन में कर्म, विकर्म, कर्मयोग और कर्मसंन्यास का भेद भी स्पष्ट किया गया। विकर्म उसे कहा गया जो न शास्त्रीय कर्म करता है और न ही भक्ति—ऐसे व्यक्ति का फल नरक है। कर्मयोगी शरीर से यथाशक्ति कर्म करता है, पर उसका मन निरंतर भगवान में लगा रहता है। मन की आसक्ति जहाँ होती है, फल भी वहीं से मिलता है, इसलिए कर्मयोगी को भगवत् प्राप्ति होती है और उसकी माया निवृत्ति हो जाती है। कर्मसंन्यासी भी शारीरिक कर्मों का त्याग कर देता है।


