बिना जांच बना ड्राइविंग लाइसेंस के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट:300 रुपए में दुकान में मिल रहा, लाइसेंस भी रिन्यू कर दिया; डॉक्टर को मिला नोटिस

‘आप बेफिक्र रहें, आपका ड्राइविंग लाइसेंस बन जाएगा। आंखों में कमजोरी है तो भी काेई बात नहीं। हाथों-हाथ मेडिकल सर्टिफिकेट बनाकर देंगे। ना सरकारी डॉक्टर के पास जाना होगा। ना पर्ची कटवानी होगी। आप बस तीन सौ रुपए दे दो। सर्टिफिकेट मिल जाएगा।’ इस दावे के बाद एजेंट डिटेल भरने के लिए आधार कार्ड लेता है। एक कमरे में जाता है और दस मिनट में मेडिकल सर्टिफिकेट बनाकर दे देता है। वह भी सरकारी अस्पताल की ओपीडी वाली पर्ची पर। जिसमें आंखों की रोशनी एकदम सही छह बाई छह की बताई गई। खास बात ये है कि जो मेडिकल सर्टिफिकेट बनाया गया उसके लिए आवेदक की जांच होने में ही कम से कम दो घंटे लगते हैं। ड्राइविंग लाइसेंस के लिए फर्जी तरीके से मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने का ये खेल राजस्थान के भिवाड़ी में चल रहा है। जिसमें जिला सरकारी हॉस्पिटल का डॉक्टर भी शामिल है। पढ़ें- कैसे होता है फर्जीवाड़ा… इन्फॉर्मेशन मिलते ही सबसे पहले दो सवाल मन में आए- प्लान- 1: युवक का सर्टिफिकेट बनवाया, लाइसेंस भी रिन्यू हो गया भिवाड़ी में रहने वाले साहिल खान नाम के एक युवक को एजेंट के पास भेजा गया। 10 दिसंबर, 2025 को साहिल डीटीओ ऑफिस में लाइसेंस रिन्यू करवाने पहुंचा। साहिल को डीटीओ ऑफिस के बाहर ही एजेंट मिल गए। एजेंट ने साहिल से पूछा- लाइसेंस रिन्यू करवाना है। साहिल ने हां में जवाब दिया। डीटीओ के बाहर ही दलाल ने बताया ठिकाना एजेंट ने साहिल से कहा कि लाइसेंस रिन्यू करवाने के लिए आपको मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाना पड़ेगा। सरकारी डॉक्टर की पर्ची कटेगी। बिना उसके काम नहीं होगा। फिर पास आकर बोला हम हाथों-हाथ बिना झंझट करवा देंगे, फिर उसी ने साहिल को एक ब्लैंक फॉर्म देकर सामने की ओर इशारा कर कहा, वहां चले जाओ, सारा काम हो जाएगा। साहिल खान रोड क्रॉस कर करीब 50 मीटर दूर एक दुकान में पहुंचे। 300 रुपए दिए, 10 मिनट में फर्जी सर्टिफिकेट मिला दुकान के बाहर ही रामअवतार शर्मा नाम का एक शख्स मिला। उसने जाते ही पूछ लिया मेडिकल बनवाना है… 300 रुपए लगेंगे। साहिल ने पैसे दिए। इसके बाद रामअवतार शर्मा ने 10 मिनट बाद जिला अस्पताल की ओपीडी की पर्ची दी। इस पर विजन 6/6 लिखा था, यानी लाइसेंस के लिए एक दम सही नजर क्षमता है। फॉर्म और ओपीडी की पर्ची पर सरकारी डॉक्टर इंद्रपाल यादव का स्टांप और साइन भी किया हुआ था। हालांकि ओपीडी की पर्ची पर पहले किसी महिला का नाम लिखा हुआ था। पहले से लिखे नाम को रामअवतार ने काट कर साहिल खान का नाम और उम्र लिखा। ओपीडी की पर्ची देख कर शक हुआ कि शायद ये स्लिप ना चले और रिन्यू आवेदन रिजेक्ट हो जाए, लेकिन पूरे मामले की सच्चाई पता करने के लिए इस स्लीप को लेकर साहिल दोबारा डीटीओ ऑफिस के बाहर एजेंट के पास गया। एजेंट ने लाइसेंस रिन्यू के लिए ऑनलाइन आवेदन किया। 11 दिसंबर को साहिल का लाइसेंस भी बनकर आ गया। प्लान 2: रिपोर्टर ने खुद का मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाया बुधवार (17 दिसंबर, 2025) को रिपोर्टर अनूप कौशिक हिडन कैमरा लगाकर भिवाड़ी डीटीओ कार्यालय पहुंचे। बाहर कुछ एजेंट मिले। उनसे हमारे रिपोर्टर ने पूछा कि लाइसेंस रिन्यू करवाना है क्या-क्या करना होगा। एक एजेंट ने बताया– एक एनओसी बनवानी होगी और एक मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाना पड़ेगा। इसके बाद साहिल खान की तरह ही भास्कर रिपोर्टर को भी एजेंट ने एक ब्लैंक फॉर्म के साथ उस दुकान पर भेज दिया। जहां फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाया जा रहा था। उस वर्कशाप के बाहर कुर्सी पर रामअवतार (फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने वाला) बैठा मिला। रिपोर्टर: लाइसेंस रिन्यू के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाना है। रामअवतार: बन जाएगा। तीन सौ रुपए लगेंगे। रिपोर्टर: जांच कहां होगी हॉस्पिटल में ? रामअवतार: नहीं-कोई जरूरत नहीं है। सारा काम यहीं हो जाएगा। इसके बाद रामअवतार ने फॉर्म पर डिटेल भरने के लिए आधार कार्ड मांगा। आधार कार्ड लेकर वह अंदर गया और भिवाड़ी जिला अस्पताल की एक ओपीडी की पर्ची लेकर आया। इसके साथ भरा हुआ मेडिकल सर्टिफिकेट भी था। बाहर आकर रामअवतार ने रिपोर्टर को दोनों डॉक्यूमेंट और आधार कार्ड लौटा दिया। रिपोर्टर: ये सर्टिफिकेट लाइट के लिए ही है क्या ? रामअवतार: इस सर्टिफिकेट से लाइट (हल्के वाहन) और हेवी (भारी वाहन) किसी भी तरह का लाइसेंस बन जाएगा। रिपोर्टर: डॉक्टर साहब से मिल सकते हैं क्या? जिस पर रामअवतार ने मना कर दिया। कहा कि वे अभी बिजी हैं। शाम पांच बजे बाद मिलेंगे। रिपोर्टर अनूप कौशिक 17 दिसंबर की शाम पांच बजे भी वापस उस जगह पहुंचे, लेकिन डॉक्टर तब भी नहीं मिला। सरकारी अस्पताल की पर्ची बनाई, डॉक्टर की मोहर तक लगी सर्टिफिकेट बनाने वाले व्यक्ति रामअवतार ने रिपोर्टर को जो पर्ची दी, वह भिवाड़ी राजकीय अस्पताल की पर्ची थी। जो कंप्यूटराइज्ड होती है। ये स्लिप 16 दिसंबर को दोपहर 12 बजकर 46 मिनट पर कटी थी। जबकि रिपोर्टर एक दिन बाद 17 दिसंबर को मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाने गया था। इस पर्ची पर किसी और मरीज का नाम भी लिखा था। उस नाम को काटकर उसकी जगह अनूप कौशिक का नाम लिखा गाय था। इस पर Vision 6/6 लिखा था। डॉ. इंद्रपाल ने माना- मैं ही बनाता हूं सर्टिफिकेट इस बारे में भिवाड़ी जिला अस्पताल के सोनोलॉजिस्ट डॉक्टर इंद्रपाल यादव से भी फोन पर बात की। शुरुआत में तो डॉक्टर इंद्रपाल ने फर्जी सर्टिफिकेट बनाने की बात पर इनकार किया। इसके बाद कहा कि मैं पेपर नहीं देखता हूं, जो व्यक्ति साइन करवाने मेरी दुकान शिवम ट्रेडर्स पर आता है। मैं साइन कर देता हूं। इस पर जब रिपोर्टर ने कहा कि मेरे पास वो पर्ची है जिस पर आपने पहले से अस्पताल की कटी हुई ओपीडी पर्ची पर नाम काट कर दूसरे व्यक्ति का मेडिकल सर्टिफिकेट बनाया है। इस पर डॉ. इंद्रपाल फोन पर ही ये कह कर हंसने लगा कि अच्छा आपको पता है। ठीक है हम मिल कर बात कर लेते हैं। रिपोर्टर की डॉक्टर इंद्रपाल की फोन पर हुई पूरी बातचीत पढ़ें- रिपोर्टर: मैं मेडिकल सर्टिफिकेट के बारे में आपसे बात करना चाह रहा था। आप कैसे बनाते हो वो सर्टिफिकेट।
डॉक्टर: वो मैं ही बना रहा हूं। रिपोर्टर: तो आप हॉस्पिटल में नहीं बनाते। ऐसे घर पर कैसे बना रहे हो ?
डॉक्टर: नहीं, हॉस्पिटल में बनाते हैं। रिपोर्टर: दिन में जो आपके यहां (शिवम ट्रेडर्स नाम की दुकान पर) लड़के बैठे हैं वो बना कर देते हैं?
डॉक्टर: लड़के नहीं बनाते। रिपोर्टर: वो कौन हैं जो बना कर देते हैं। अपने उनको अपनी सील (स्टाम्प) दे रखी है क्या ?
डॉक्टर: मैंने किसी को नहीं दे रखी है, सील-वील…. रिपोर्टर: आप ड्यूटी कर रहे हो और मेडिकल सर्टिफिकेट ये लड़के बना कर दे रहे हैं। ये कैसे संभव है?
डॉक्टर: कौन लड़के बनाकर दे रहे हैं? रिपोर्टर: शिवम ट्रेडर्स पर
डॉक्टर: वो तो वहां मैं रहता हूं। जब हॉस्पिटल में नहीं रहता हूं तो वो (मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाने वाले) आते हैं। रिपोर्टर: शिवम ट्रेडर्स पर आप रहते हो और वहीं मेडिकल सर्टिफिकेट बना कर देते हो। ये सरकारी अस्पताल की पर्ची कहां से आती है?
डॉक्टर: वो वहीं से आती होगी, पता नहीं मुझे। रिपोर्टर: आप घर पर मेडिकल सर्टिफिकेट बना कर देते हो। ओपीडी की पर्ची तो सरकारी अस्पताल में मिलती है ना। घर पर कहां से आती है ?
डॉक्टर: वो तो मेरे पास पर्ची आ जाती है। जैसे आपको सर्टिफिकेट बनवाना है तो आप ले आओ अपनी पर्ची। रिपोर्टर: जो मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाने आ रहा है। वो सरकारी अस्पताल से पर्ची बनवाकर थोड़े ना आया होगा। वो तो डायरेक्ट आ रहा आपके पास मेडिकल बनवाने के लिए।
डॉक्टर: वो लेकर आते है जो भी बनवाते हैं। रिपोर्टर: आप ही तो कह रहे हो डॉक्टर साहब कि मैं घर पर ही बनाकर देता हूं खुद ही।
डॉक्टर: नहीं-नहीं पर्ची तो वो खुद ही लेकर आ रहा है। मैं थोड़े ना पर्ची बनाऊंगा। रिपोर्टर: ये जो ओपीडी स्लिप तो किसी थर्ड पर्सन के नाम कटी हुई है और फिर जो मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाने आ रहा है उसका नाम काट के लिखा जा रहा है।
डॉक्टर: ये मैं नहीं देखता, नाम किसका लिखा हुआ है किसका नहीं। रिपोर्टर: ये जो किसी और की ओपीडी की पर्ची पर नाम काट कर दूसरे का नाम लिखा जाता है। ये तो डाउटफुल है।
डॉक्टर: ये आपने कहां देख लिया… (हंसते हुए) रिपोर्टर: मेरे पास पर्ची है….
डॉक्टर: अच्छा… ठीक है…. समझ गया… समझ गया मैं… (डॉक्टर इंद्रपाल हंसने लगता है।) डॉक्टर: लगता है आप मुझसे पहले कहीं मिले नहीं हुए। (डॉक्टर फिर हंसने लगता है।)
रिपोर्टर: नहीं मैं आपसे पहले नहीं मिला। इसके बाद डॉक्टर इंद्रपाल सोमवार को रिपोर्टर से मिल कर बात करने की कहने लगता है। ऐसे चलता है फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने का गेम इस पूरे खेल को समझते हुए हमें ये पता चला कि ये एजेंट सरकारी अस्पताल की दर्जनों पर्चियां फर्जी नाम से काटकर अपने पास पहले से रख लेते हैं। जब कोई ग्राहक डीटीओ ऑफिस पहुंचता है तो उसे दलाल जल्दी सर्टिफिकेट बनाने का लालच देते हैं। ग्राहक को डीटीओ ऑफिस से महज 50 मीटर दूर एक दुकान जैसे दुकान पर जाने के लिए कहते हैं। ग्राहक जैसे ही दुकान पर पहुंचता है। वहां पहले से बैठा दूसरा एजेंट ग्राहक से आधार कार्ड लेकर फॉर्म में डिटेल भरकर डॉक्टर का स्टांप साइन लगा देता है। इसके साथ पहले से बनवाई गई ओपीडी स्लिप पर फर्जी नाम काटकर ग्राहक का नाम और उम्र लिख देता है। क्या बोले जिम्मेदार? भिवाड़ी जिला हॉस्पिटल के प्रभारी डॉ सागर अरोड़ा ने बताया कि – डीटीओ ऑफिस से फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट के जरिए लाइसेंस बनवाने की शिकायत पहले भी आई थी। इस पर मैंने डीटीओ भिवाड़ी को पत्र लिखकर सावधानी बरतने के लिए कहा था। मेडिकल के साथ विशेषज्ञ डॉक्टर की लेटरपैड पर ऑब्जर्वेशन जरूरी है। अगर यह चीज नहीं है तो भी मेडिकल सर्टिफिकेट वैलिड नहीं माना जा सकता है। वहीं, भिवाड़ी डीटीओ राजीव चौधरी का कहना है कि – प्रार्थी मेडिकल सर्टिफिकेट खुद बनवाकर लाता है। खुद ही सारथी पोर्टल पर अपलोड करवाता है। इसमें डीटीओ ऑफिस में क्रॉस वेरिफिकेशन की कोई व्यवस्था नहीं है। अगर प्रार्थी फर्जी मेडिकल बनवाकर लाता है तो उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। दो घंटे की जांच के बाद मिलता है मेडिकल सर्टिफिकेट भिवाड़ी में नेत्र रोग विशेषज्ञ के तौर पर प्रेक्टिस कर रही डॉ. मोनिका यादव ने बताया- ड्राइविंग लाइसेंस के मेडिकल में सबसे महत्वपूर्ण है किसी व्यक्ति की दृष्टि (विजन)। मेडिकल स्टैंडर्ड के हिसाब से कम से कम 6 लेवल पर जांच करना जरूरी है। कलर विजन नॉर्मल होना अनिवार्य है, डिफेक्टिव कलर विजन को स्वीकार नहीं किया जाता। उसके बाद दवाई डालकर पर्दे की जांच की जाती है। पूरी प्रक्रिया में करीब 1 से 2 घंटा लगता है। तब जाकर तय होता है कि व्यक्ति सभी मानकों को पूरा करता है या नहीं। फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने वाले डॉक्टर को नोटिस
इस खुलासे के बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया। चिकित्सा विभाग के संयुक्त निदेशक ने भिवाड़ी जिला अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी (पीएमओ) डॉ. सागर अरोड़ा से मामले की तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है। पूरी खबर पढ़ें… ​​​​​​​

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