ग्वालियर हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने शनिवार को सुनवाई के दौरान जमीन के एक सौदे में दर्ज धोखाधड़ी की दो FIR को निरस्त करने से साफ मना कर दिया है। कोर्ट का तर्क है कि जब प्रथम दृष्टया जालसाजी, धोखाधड़ी और दस्तावेजों में हेराफेरी के तथ्य सामने आते हैं, तो FIR को रद्द नहीं किया जा सकता है। कोई भी सिविल विवाद की आड़ में अपराध को छिपा नहीं सकता है। बता दें कि शिवपुरी के कोतवाली थाना में एक जमीन के मामले में क्रेता व विक्रेता की ओर से एक दूसरे पर अलग-अलग FIR दर्ज हैं। संपत्ति सौदे को लेकर शुरू हुआ विवाद जानकारी के अनुसार एक विवादित संपत्ति के सौदे को लेकर दो पक्षों के बीच लेन-देन हुआ था और करीब 85 लाख रुपए का भुगतान भी किया गया। बाद में सौदा पूरा नहीं होने पर पहले एक प्रकरण खरीदार की ओर से दर्ज हुई थी। एक FIR के जवाब में विक्रेता पक्ष ने समझौते को फर्जी बताते हुए धोखाधड़ी का दूसरा प्रकरण दर्ज कराया। याचिकाकर्ता नरेंद्र जैन ने तर्क दिया कि पूरा विवाद सिविल प्रकृति का है और समझौते की वैधता पहले से सिविल कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का अधिकार नहीं था। दूसरे पक्ष से गौरव पचौरी ने भी एफआईआर निरस्त करने याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने दोनों की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट के सामने यह तथ्य आए सामने
पहले दर्ज एफआईआर में स्वयं याचिकाकर्ताओं ने समझौते को ओरल बताया था, जबकि बाद में सिविल कोर्ट में उन्होंने एक लिखित समझौता पेश किया। इतना ही नहीं, जिस तारीख का समझौता बताया गया, उसका स्टांप पेपर एक साल बाद खरीदा गया पाया गया। कोर्ट ने कहा कि ये तथ्य प्रथम दृष्टया जालसाजी की ओर इशारा करते हैं, जिनकी जांच आवश्यक है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सिविल और आपराधिक कार्यवाही साथ-साथ चल सकती हैं। यदि आरोपों में आपराधिक तत्व झलकता है, तो केवल सिविल मुकदमे की लंबितता के आधार पर एफआईआर को रद्द नहीं किया जा सकता।


