किरंदुल नगरपालिका में पीने के पानी का संकट किसी दिन बड़ा रूप ले सकता है। हैरानी की बात यह है कि नगरपालिका के पास खुद का कोई स्वतंत्र जलस्रोत नहीं है। पूरे शहर की प्यास 11बी पहाड़ स्थित रामाबुटी चट्टान से रिसने वाले पानी से ही बुझ रही है। इसी प्राकृतिक जलधारा को पाइपलाइन के जरिए नगर तक लाकर टंकियों में संग्रहित किया जाता है और फिर घर-घर सप्लाई दी जाती है। रामाबुटी पहाड़ से हर दिन करीब 7 लाख लीटर पानी निकलता है, जो सालभर कभी सूखता नहीं। इस पानी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें आयरन की मात्रा नहीं पाई जाती, जिससे यह पूरी तरह पीने योग्य माना जाता है। रामाबुटी में मंदिर भी स्थित है और वर्षों से इसी स्रोत से किरंदुल की आबादी को पानी मिल रहा है। किरंदुल समुद्र तल से करीब 4500 फीट की ऊंचाई पर बसा है, जहां हैंडपंप तक फेल हो जाते हैं। सवाल यही है अगर रामाबुटी सूख गया, तो किरंदुल की प्यास कौन बुझाएगा? करोड़ों की योजना, फिर भी वही पुराना पानी: शुद्ध पेयजल के लिए जल आवर्धन योजना के तहत किरंदुल में करीब 7 करोड़ रुपए खर्च किए गए। वर्ष 2018-19 में वाटर फिल्टर प्लांट और पाइपलाइन बिछाने का काम हुआ। इसके बावजूद नगरवासियों को आज तक इस योजना का लाभ नहीं मिला और लोग आज भी रामाबुटी का पानी ही पी रहे हैं। बिना ट्रीटमेंट प्लांट से सीधे हो रही है सप्लाई नगरपालिका द्वारा इस पानी को शुद्ध करने के लिए कोई अलग ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाया गया है। सिर्फ टंकियों में ब्लीचिंग पाउडर डालकर पानी की सप्लाई की जाती है। वर्तमान में किरंदुल नगरपालिका की आबादी करीब 22 हजार है, जो पूरी तरह इसी एक स्रोत पर निर्भर है। खनन से जलस्रोत पर मंडरा रहा खतरा जिस बैलाडीला पहाड़ से रामाबुटी का पानी निकलता है, वही इलाका लौह अयस्क खनन क्षेत्र भी है। यहां लगातार खनन हो रहा है। यदि किसी कारण से यह जलस्रोत प्रभावित हुआ या बंद हुआ, तो किरंदुल के पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है। यह स्थिति आने वाले समय में गंभीर जल संकट को जन्म दे सकती है।


