मंच पर घुंघरुओं की झंकार, भावों की भाषा और कथक की परंपरा

सिटी रिपोर्टर }जवाहर कला केंद्र का मंच बुधवार शाम घुंघरुओं की झंकार, मुद्राओं की लय और भावों की अभिव्यक्ति से रंगा नजर आया। मौका था उपांग कथक नृत्य कला केंद्र, जयपुर की ओर से आयोजित वार्षिक कथक महोत्सव का। इसमें कलाकारों ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य की समृद्ध विरासत को सजीव किया। कार्यक्रम में 100 से अधिक छात्र-छात्राओं ने प्रस्तुतियां दीं। मन्जूश्या दानी एवं नूतन अग्रवाल ने ‘रहे ना रहे हम’ गीत पर प्रस्तुति दी। कोपल मोहनला ने ‘शिव-कैलाशों के वासी’ पर कथक प्रस्तुत किया। वर्धम डोलिया के निर्देशन में ‘निगाहें मिलाके बदल जाने वाले’ एवं ‘मोहे रंग दो लाल’ ठुमरी पर त्रियंबिका चतुर्वेदी, जीबिका, नित्या, अन्वी, फेशिखा, शिवालिका, मान्या, शिवन्या एवं मायशाने का समूह कथक ताल और भाव के सुंदर संतुलन के साथ मंचित हुआ। }युगल कथक और अनाहिका की एकल प्रस्तुति : साधना नित्या गुप्ता ने ‘बरसाने की छोरी’ पर मनोहारी नृत्य प्रस्तुत किया। रासा ताल (तेरह मात्रा) पर नवेली वशिष्ठ एवं प्रशस्ति वशिष्ठ की युगल कथक प्रस्तुति तथा अनाहिका की एकल प्रस्तुति को दर्शकों ने सराहा। श्वेता, रोसी और विजयलक्ष्मी ने शिवस्तुति प्रस्तुत की। ‘कान्हा’ गीत पर डॉ. सीमंतिनी चतुर्वेदी, पूर्णिमा एवं संगीता की प्रस्तुति भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से प्रभावी रही। कथक सीनियर ग्रुप- अवनी, अंजली, कोमल, सलोनी, साक्षी एवं भव्या की प्रस्तुति खास रही। वहीं तीन ताल में ग्यारह मात्रा अर्जुन तास भेद पर परिधि, क्रिस्यांत्री, ऋधिमा और काव्यानी ने तकनीकी रूप से सशक्त और संतुलित प्रस्तुति दी।

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