कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) को रांची में 50 सीट के मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति नहीं मिली। ईएसआईसी ने एकेडमिक सेशन 2025-26 के लिए आठ माह पहले ही एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए नेशनल मेडिकल कमिशन (एनएमसी) के पास आवेदन किया गया था। लेकिन काउंसिल की ओर से लेटर ऑफ परमिशन (एलओपी) नहीं मिला। लेकिन, इस दौरान ईएसआईसी ने पडॉक्टर- प्रोफेसरों के वेतन पर करीब तीन करोड़ रुपए खर्च कर दिए। ईएसआईसी ने अप्रैल में कुल 30 डॉक्टर-प्रोफेसरों को नियुक्त किया था। इसमें से 5 ने इस्तीफा दे दिया। बचे हुए 25 फैकल्टी को अप्रैल से नवंबर तक कुल तीन करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि आखिर एनएमसी से अनुमति नहीं मिली और एमबीबीएस की पढ़ाई भी शुरू नहीं हुई, फिर भी श्रमिकों के अंशदान से मिले पैसे को क्यों उड़ाया गया। इधर, ईएसआईसी की ओर से तीन करोड़ खर्च करने के बाद एक बार फिर नए सिरे से एमबीबीएस के 50 सीट पर पढ़ाई की अनुमति के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। नए एकेडमिक सेशन 2026-27 के लिए अनुमति प्राप्त करने के लिए अगले माह आवेदन किया जाएगा। पढ़ाई की अनुमति नहीं मिली तो डॉक्टरों को मेडिकल कैंप में लगाया ईएसआईसी को मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के 50 सीट पर एडमिशन की अनुमति नहीं मिली तो बहाल किए गए डॉक्टरों-प्रोफेसरों को दूसरे कार्यों में लगाने का दावा किया गया है। हॉस्पिटल के ओपीडी और कैजुअल्टी में कुछ प्रोफेसरों को लगाया गया है। लेकिन सच्चाई यह है कि अधिकतर फैकल्टी को बैठाकर पैसा दिया जा रहा है। उन्हें कुछ स्थानों पर लगाए जाने वाले मेडिकल कैंप, अवेयरनेस कैंप में लगाया गया है। इस तरह बेवजह पैसे खर्च किए जा रहे हैं। वह सबकुछ जो आपके लिए जानना जरूरी है अनुमति से पहले फैकल्टी की नियुक्ति क्यों मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई की अनुमति लेने के लिए कॉलेज की बिल्डिंग, हॉस्पिटल, बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टूडेंट्स के रहने के लिए हॉस्टल, सभी डिपार्टमेंट के फैकल्टी, मल्टी टास्किंग स्टॉफ, नर्सिंग स्टॉफ सहित अन्य मापदंडों का पालन करना होता है। मापदंडों का पालन नहीं होने पर नेशनल मेडिकल कमिशन से लेटर ऑफ परमिशन नहीं मिलता है। इसलिए विभिन्न विषयों के फैकल्टी को नियुक्त किया गया था। सीधी बात आर. संध्या, मेडिकल कॉलेज सह हॉस्पिटल की डीन आवेदन के लिए 30% नियुक्ति जरूरी, उन्हें वेतन तो देना होगा मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की पढ़ाई की अनुमति नहीं मिली, फिर भी फैकल्टी पर 3 करोड़ खर्च क्यों? -गाइडलाइन के तहत 30% फैकल्टी व स्टाफ नियुक्त किया गया है। क्योंकि, इसके बिना पढ़ाई की अनुमति के लिए आवेदन करना संभव नहीं है। जब नियुक्ति हुई तो उन्हें वेतन भी दिया गया। इसमें गलत नहीं है। इन फैकल्टी से क्या फायदा हुआ? – ऐसा नहीं है कि उनसे काम नहीं लिया गया। बहाल फैकल्टी सिर्फ पढ़ाने के लिए नहीं हैं। पढ़ाने के साथ उन्हें विभिन्न कार्यों में लगाया गया है। वे हॉस्पिटल के ओपीडी और कैजुअल्टी में भी सेवा देते हैं। हरेक माह उन्हें हेल्थ कैंप और अवेयरनेस प्रोग्राम में भी लगाया जाता है। मेडिकल की पढ़ाई की अनुमति नहीं मिली, ऐसे में आगे भी फैकल्टी पर खर्च जारी रहेगा या बंद होगा। -नए सेशन में पढ़ाई के लिए बहुत जल्द आवेदन किया जाएगा। इसके लिए फैकल्टी का होना जरूरी है, इसलिए उन्हें रखा जाएगा। एक्सपर्ट व्यूः अनुमति नहीं मिली तो संस्थान को उठाना पड़ता है नुकसान मेडिकल कॉलेज खोलने और एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए बहुत सारे मापदंडों का पालन करना होता है। इसमें फैकल्टी की नियुक्ति और मेडिकल स्टॉफ की नियुक्ति होना अनिवार्य है। क्योंकि, जब एनएमसी से इन्वेस्टिगेटिंग टीम आती है तो वह उन सभी चीजों को देखती है। ऐसे में किसी कारणवश परमिशन नहीं मिलता है तो फैकल्टी सहित अन्य स्टॉफ पर हुए खर्च का नुकसान संस्था को उठाना पड़ता है। – डॉ. विमलेश कुमार सिंह, रजिस्ट्रार सह सेक्रेट्री, झारखंड स्टेट मेडिकल काउंसिल


