भास्कर न्यूज | दंतेवाड़ा आदिवासी समाज में अंतिम संस्कार की परंपराओं को लेकर एक सकारात्मक और संवेदनशील बदलाव की शुरुआत हुई है। पालनार गांव से शुरू हुई यह नई रीति अब जगरगुंडा क्षेत्र तक पहुंच चुकी है। इस पहल का उद्देश्य मृतक परिवार पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करना और सहयोग को अधिक उपयोगी रूप देना है। अब तक आदिवासी समाज में किसी की मृत्यु होने पर रिश्तेदार और सगा-संबंधी बड़ी संख्या में कफन, कपड़े, चादर, कंबल और बर्तन लेकर पहुंचते थे। ये सभी सामग्री शव के साथ श्मशान तक जाती थी और अंततः जला दी जाती थी। इस प्रक्रिया में हजारों रुपये की सामग्री नष्ट हो जाती थी, जबकि कई परिवार आर्थिक रूप से पहले से ही कमजोर होते हैं। कई मामलों में अंतिम संस्कार के खर्च के लिए गरीब परिवारों को जमीन तक गिरवी रखनी पड़ती थी। इसी स्थिति को देखते हुए समाज ने परंपरा में बदलाव का निर्णय लिया। अब शव के ऊपर केवल एक कफन डाला जा रहा है, जबकि पहले सैकड़ों की संख्या में कपड़े डाले जाते थे। इसके बदले जो लोग पहले कफन या अन्य सामग्री लेकर जाते थे, वे अब उतनी ही राशि नगद लेकर पहुंच रहे हैं और मृतक परिवार के घर के सामने रखी गई दान पेटी में डाल रहे हैं। सुकमा जिले के आदिवासी समाज अध्यक्ष उमेश सुंडाम, गंगा सोढ़ी सहित समाज के अन्य प्रमुख अब इस परंपरा को गांव-गांव तक पहुंचाने में जुटे हैं। समाज के लोगों का कहना है कि यह बदलाव गरीब परिवारों के लिए बेहद राहत भरा साबित होगा। अब अंतिम संस्कार के लिए कर्ज लेने या जमीन गिरवी रखने की मजबूरी नहीं रहेगी। पालनार से शुरुआत हुई पालनार गांव में इसकी शुरुआत हो चुकी है और जगरगुंडा क्षेत्र के गांवों में भी यह प्रथा अपनाई जाने लगी है। जिस घर में मृत्यु होती है, वहां घर के सामने एक दान पेटी रख दी जाती है। समाज के लोग इसमें 50, 100 या अपनी क्षमता अनुसार राशि डालते हैं। इस प्रक्रिया से कई मामलों में 10 हजार रुपये तक की राशि एकत्र हो रही है, जिससे मृतक परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता मिल रही है। सुकालू मुड़ामी ने बताया कि जगरगुंडा क्षेत्र के तारलागुड़ा गांव में बुधराम के पुत्र की मृत्यु के बाद पहली बार कफन की जगह दान पेटी में आर्थिक सहयोग की शुरुआत की गई।


