‘जशक्राफ्ट’ से ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भर बन रहीं, कालीन शिल्प की सीख रही बारीकी

भास्कर न्यूज ​| जशपुरनगर छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में पारंपरिक हस्तशिल्प और ग्रामीण उद्यमिता को नई पहचान दिलाने के उद्देश्य से “जशक्राफ्ट” ब्रांड के तहत बड़े स्तर पर कौशल विकास कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय की सीएचसीडीएस परियोजना के अंतर्गत “डिजाइन एंड डेवलपमेंट वर्कशॉप ऑन कारपेट क्राफ्ट” यानी कालीन शिल्प पर डिजाइन एवं विकास कार्यशाला का आयोजन किया गया है। यह कार्यशाला जशपुर विकासखंड के बालाछापर स्थित रीपा परिसर में 19 दिसंबर से प्रारंभ होकर 18 मार्च तक चलेगी। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प विकास बोर्ड द्वारा जिला प्रशासन और बिहान (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) के सहयोग से किया जा रहा है। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक कालीन शिल्प को आधुनिक डिजाइन, बेहतर गुणवत्ता और बाजार की मांग के अनुरूप विकसित करना है, ताकि ग्रामीण कारीगरों को स्थायी रोजगार और बेहतर आय मिल सके। कार्यशाला में जिले की 30 ग्रामीण महिलाओं को शामिल किया गया है, जिन्हें कालीन निर्माण की बारीक तकनीक, रंग संयोजन, डिजाइन नवाचार और फिनिशिंग का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प विकास बोर्ड के क्षेत्रीय प्रबंधक राजेंद्र राजवाड़े ने बताया कि यह कार्यक्रम विशेष रूप से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। प्रशिक्षण अवधि के दौरान प्रत्येक महिला को प्रतिदिन 300 रुपए की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है, जिससे वे बिना किसी आर्थिक दबाव के प्रशिक्षण में पूरा ध्यान दे सकें। इससे महिलाओं में सीखने के प्रति उत्साह और आत्मविश्वास दोनों बढ़ रहे हैं। प्रशिक्षण के साथ प्रोत्साहन और बाजार की गारंटी कार्यशाला की एक बड़ी विशेषता यह है कि प्रशिक्षण के बाद महिलाओं द्वारा तैयार किए गए कालीनों और अन्य हस्तशिल्प उत्पादों के विपणन की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प विकास बोर्ड स्वयं उठाएगा। इससे कारीगरों को बाजार की चिंता नहीं करनी पड़ेगी और उन्हें अपने उत्पादों का उचित मूल्य सीधे प्राप्त होगा। अधिकारियों के अनुसार, ‘जशक्राफ्ट’ ब्रांड के माध्यम से तैयार किए गए उत्पादों को राज्य और राष्ट्रीय स्तर के हस्तशिल्प मेलों, प्रदर्शनियों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया जाएगा। इससे जशपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में तैयार शिल्प उत्पादों को नई पहचान मिलेगी।

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