लेखक बोले- शुद्ध हिंदी जैसी कोई चीज नहीं होती:भाषाएं नदी की तरह होती हैं, जो बहते समय नए शब्द और विचारों को अपने साथ लेकर चलती हैं

प्रभा खेतान फाउंडेशन की पहल कलम के तहत जयपुर में आयोजित साहित्यिक सत्र में प्रख्यात लेखक एवं कथाकार दिव्य प्रकाश दुबे ने अपनी लेखनी और जीवन के अनुभवों को साझा किया। सत्र का आयोजन होटल आईटीसी राजपूताना में किया गया, जहां दर्शकों ने लेखक के विचारों और कहानियों का भरपूर आनंद लिया। इस सत्र का संचालन और संवाद फिल्म और थिएटर कलाकार एवं लेखिका रमा पांडे ने किया। बातचीत के दौरान दिव्य प्रकाश दुबे ने न केवल अपने लेखन की यात्रा के रोचक किस्से सुनाए, बल्कि हिंदी भाषा और साहित्य के विकास पर भी चर्चा की। कार्यक्रम के दौरान दिव्य प्रकाश दुबे ने अपनी नई किताब यार पापा का उल्लेख किया। जो पिता-पुत्र के रिश्तों पर आधारित है। जब उनसे हिंदी लेखन में शुद्ध हिंदी के महत्व पर सवाल किया गया तो उन्होंने एक गहरी और दिलचस्प बात कही कि शुद्ध हिंदी जैसी कोई चीज नहीं होती। भाषाएं नदी की तरह होती हैं, जो बहते समय नए शब्द और विचारों को अपने साथ लेकर चलती हैं। अगर इन्हें शुद्ध बनाने का प्रयास किया जाए तो वे तालाब बन जाती हैं। उनके इस विचार ने दर्शकों की गहरी सहमति और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ माहौल को और भी जीवंत बना दिया। सात किताबों की लेखनी और विविधता दिव्य प्रकाश दुबे ने बताया कि उनकी अब तक प्रकाशित सातों किताबें अलग-अलग विषयों पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि हर किताब में एक नई सोच और नया दृष्टिकोण शामिल होता है, जो पाठकों को जोड़ता है। उनकी सहज और दिलचस्प शैली ने उन्हें आज के युवाओं का चहेता लेखक बना दिया है। इस सत्र का आयोजन प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा किया गया, जिसमें वीकेयर, अहसास वूमेन ऑफ जयपुर और आईटीसी राजपूताना ने सहयोग दिया। अतिथियों का स्वागत और धन्यवाद ज्ञापन अहसास वूमेन की अपरा कुच्छल ने किया। कार्यक्रम के अंत में आईटीसी राजपूताना के जनरल मैनेजर दीपेंद्र राणा ने दिव्य प्रकाश दुबे और रमा पांडे को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया।

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