न मैदान और न ही फुटबॉल का माहौल फिर भी ग्रामीण परिवेश से आने वाली 37 बेटियां नेशनल खिलाड़ी बन गईं । इतना ही नहीं इनमें से कई खिलाड़ी देश के बड़े-बड़े क्लबों के लिए फुटबॉल खेल रहीं हैं। बेहद ही साधारण परिवार से आने वाली इन बेटियों के लिए यहां तक का सफर आसान नहीं था। किसी ने शाॅर्ट्स पहनने पर ग्रामीणों के ताने सुने तो किसी को शादी रुकवाने के लिए अपने ही परिजनों के खिलाफ खड़ा होना पड़ा। भरतपुर जैसे शहर में जहां पर फुटबॉल का एक भी ग्राउंड नहीं है। फिर भी वहां फुटबॉल की अलख जागने वाले राजस्थान फुटबॉल एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्यक्ष अरविंद पाल बताते हैं कि 2018 से अब तक 37 बेटियां सीनियर वर्ग में राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। इनमें से कई बेटियां कोच, पीटीआई सहित अन्य विभागों में राजस्थान व भारत सरकार में सेवाएं दे रहीं हैं। नेशनल खिलाड़ी बनने की कहानी में संघर्ष, विरोध और मेहनत के कई रंग हैं। पढि़ए पूरी रिपोर्ट… लड़कों के साथ खेलना शुरू किया, 5 बार नेशनल खेल चुकीं खुशी बचपन से ही फुटबॉल का शौक रखने वाली 19 वर्षीय खुशी चंदेल 5 बार नेशनल प्रतियोगिता खेल चुकी हैं। शुरुआत में लड़काें के साथ फुटबॉल खेलना पड़ा। इनके पिता धनपाल सिंह की फोटो स्टूडियो की दुकान है। रोजाना 15 किमी साइकिल चला प्रैक्टिस के लिए आती थी दीक्षा कसौदा निवासी 20 वर्षीय दीक्षा कुमारी 3 बार नेशनल टूर्नामेंट खेल चुकी हैं। वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में प्रतिष्ठित क्लबों के लिए खेल रही हैं। दीक्षा का गांव से नेशनल तक का सफर बहुत संघर्षपूर्ण रहा है। दीक्षा के पिता महेशचंद ऑटो चलाते हैं। दादा-दादी और ग्रामीणों के विरोध के बावजूद भी दीक्षा रोजाना साइकिल से 15 किमी का सफर तय कर प्रैक्टिस के लिए जाती थी। “मुख्यालय पर फुटबॉल का एक भी ग्राउंड नहीं है। जिला फुटबॉल संघ ने निजी स्कूलों के मैदान किराए पर लेकर बेटियों की प्रेक्टिस कराई है। कई बेटियां देश के प्रतिष्ठित क्लबों से खेल रहीं हैं। सरकार से मांग की है कि भरतपुर में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की फुटबॉल एकेडमी बने।” -अरविंद पाल सिंह, प्रदेश उपाध्यक्ष, राजस्थान फुटबॉल संघ “2017 में चार लड़कियों के साथ सिमको फुटबॉल क्लब शुरू किया था। अब तक करीब 400 लड़के-लड़कियां अब तक फुटबॉल खेल चुके हैं। जिनमें से 50 से अधिक खिलाड़ी स्पोर्ट्स कोटे से सरकारी सेवाओं में चयनित हो चुके हैं।” – हीरेद्र सिंह, फुटबाॅल कोच 4 साल पहले पिता निकाह करना चाहते थे, अब नेशनल खिलाड़ी 18 वर्षीय यासमीन दो बार नेशनल खेल चुकी हैं। टीम में मिड फील्डर की कमान संभालती हैं। लेकिन इस कमान को संभालने के लिए यासमीन को परिवार से ही बगावत करनी पड़ी। क्योंकि परिवारजन बड़ी बहन के साथ यासमीन का निकाह करना चाहते थे लेकिन कोच हीरेंद्र के समझाने पर माने । पिता चांद मोहम्मद सिमको में काम करते हैं। जो कि मूलत बिहार के निवासी हैं। शादी के खिलाफ खड़ी हुईं, अब टॉप फॉरवर्ड इकरन की दो बहनें कामिनी और कविता ने फुटबॉलर बनने के लिए रोज 30 किमी साइकिल चलाई है, साथ ही शादी के विरोध में परिवार के खिलाफ जाना पड़ा। राजस्थान की बेस्ट राइट फॉरवर्ड कामिनी तीन बार नेशनल टूर्नामेंट खेल चुकी हैं। वहीं बड़ी बहन कविता भी दो बार राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर चुकी है। दोनों क पिता गुलजारीलाल बस ड्राइवर हैं।


