खेल, प्रोजेक्ट या पब्लिक स्पीकिंग जैसी गतिविधियों में बच्चों को शामिल करें। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। गलतियों को स्वीकार करना सिखाएं: बच्चों को बताएं कि गलती करना सामान्य है और उससे सीखना जरूरी है। इससे उनका डर कम होगा। खाने, कपड़े पहनने, स्कूल जाने जैसे रोज़मर्रा के फैसलों में बच्चों को आज़ादी दें। डरपोक बच्चे अक्सर नकारात्मक फीडबैक से डरते हैं। उनकी छोटी-छोटी सफलताओं को नोट करें और सराहें। पैरेंट्स को यह समझना जरूरी है कि सुरक्षा और स्वतंत्रता का संतुलन बच्चे के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। बहुत अधिक सुरक्षा से डर पैदा होता है, और डर आत्मनिर्भरता और सामाजिक क्षमता को कमजोर करता है। एक 10 साल का बच्चा, जो हमेशा माता-पिता के साथ हर काम करता था, स्कूल में अकेले खेल या प्रेजेंटेशन करने से डरता था। विशेषज्ञ ने माता-पिता को निर्देश दिया कि वे बच्चे को छोटे-छोटे निर्णय लेने दें और धीरे-धीरे चुनौती बढ़ाएं। छह महीने में बच्चा खेल और प्रेजेंटेशन में सक्रिय होने लगा और डर कम हुआ। संतुलित पालन-पोषण से बच्चे न सिर्फ आत्मनिर्भर बनते हैं, बल्कि भविष्य में चुनौतियों का सामना करने में भी सक्षम रहते हैं। पैरेंट्स को समझना होगा कि सुरक्षा देना जरूरी है, लेकिन उसे इतना बढ़ा देना कि डर पैदा हो जाए, बच्चों के लिए नुकसानदेह है। सही मार्गदर्शन, स्वतंत्रता और सकारात्मक फीडबैक से बच्चे मजबूत, साहसी और आत्मविश्वासी बनते हैं। भास्कर न्यूज |लुधियाना बच्चों को सुरक्षित रखना हर पैरेंट की फिक्र होती है, लेकिन जब सुरक्षा की चिंता जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है, तो बच्चों में आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की कमी देखने को मिलती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ओवरप्रोटेक्टिव या अधिक सुरक्षात्मक पालन-पोषण से बच्चे छोटे-छोटे फैसले लेने में हिचकिचाने लगते हैं, नई चीज़ों को ट्राई करने से डरते हैं और सामाजिक रूप से पीछे रह जाते हैं। बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ बताती हैं कि ऐसे बच्चे अक्सर हर काम के लिए पैरेंट्स पर निर्भर रहते हैं। स्कूल में ग्रुप एक्टिविटी, खेल, प्रेजेंटेशन या दोस्त बनाना जैसे सामान्य काम भी उनके लिए चुनौती बन जाते हैं। घर में छोटे-छोटे फैसले जैसे खाने की पसंद, खेल की गतिविधि या दोस्तों के साथ बाहर जाना भी इन्हें डराने लगता है। कई केस स्टडीज में देखा गया है कि ऐसे बच्चे अगर थोड़ी असफलता का सामना करते हैं, तो उनका आत्मविश्वास झटके में आ जाता है। वे आलोचना या अस्वीकृति से जल्दी घबराते हैं। जब पैरेंट्स हर कदम पर बच्चों की मदद करते हैं, उनके सामने संभावित खतरों को बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं या हर छोटी गलती पर डांटते हैं, तो बच्चे समझने लगते हैं कि दुनिया खतरों से भरी है। धीरे-धीरे उनका साहस कम होता है और वे जोखिम लेने से डरने लगते हैं। बच्चों को जिम्मेदारियां दें और उन्हें पूरा करने का मौका दें। जरूरत पड़ने पर मार्गदर्शन करें, लेकिन हर काम अपने हाथ से न करें।


