किन्नर को गाद्दीपति बनाने की अनोखी परंपरा:देशभर के किन्नर जुटे, चूड़ा फोड़ विधवा बनाया, अगले दिन सुहागिन बनाकर पगड़ी दस्तूर

किन्नरों में गाद्दीपति बनाने के लिए अनोखी रस्म निभाई जाती है। इस रस्म को निभाने के लिए देशभर के किन्नर एक जगह इकठ्ठे होते है। 3 दिन रोज अलग अलग तरह की रस्में निभाई जाती है। तब जाकर किन्नर को इलाके की गाद्दीपति की घोषणा की जाती है। जिसे पगड़ी रस्म भी कहा जाता है। इन दिनों कोटा में मनीषा किन्नर को गाद्दीपति बनाने की रस्में की जा रही है। शहर के गुमानपुरा क्षेत्र में लाला लाजपतराय सामुदायिक भवन में किन्नर समाज का तीन दिवसीय प्रोग्राम आयोजित किया। जिसमें देशभर के किन्नर जुटे। कौंन व कैसे बनता है उत्तराधिकारी कोटा श्रीपुरा इलाके की गाद्दीपति ममता बाई ने बताया कि किन्नर समाज की ये सालों पुरानी परंपरा है। गुरू के देहांत के बाद उसकी जगह उसके खास शिष्य को क्षेत्र की बागडोर (उत्तराधिकारी) संभालाई जाती है। ताकि इलाकों को लेकर किन्नरों में आपस में किसी तरह का विवाद ना हो। साथ ही वो किन्नर जो पगड़ी रस्म के आयोजन का पूरा खर्च उठा सकें। उत्तराधिकारी कौन…पंच पटेल करते है फैसला शिष्य का चयन देशभर के किन्नर पंच पटेल सामूहिक निर्णय से करते है। उसके बाद तारीख व समय निश्चित किया जाता है। फिर सभी एक जगह इकठ्ठा होकर बरसों पुरानी परंपरा के अनुसार पगड़ी की रस्म निभाते। 3 दिन तक अलग अलग कार्यक्रम होते है। मनीषा बाई किन्नर की पगड़ी व गाद्दीपति की रस्म में देश के अलग अलग राज्यों से 300 से 400 किन्नर कोटा में आए। पहले दिन चूड़ा फोड़,सफेद कपड़े पहनाते कोटा गाद्दीपति तारा देवी किन्नर ने बताया कि किन्नर को गाद्दीपति बनाने के लिए गुरू की उत्तराधिकारी का पहले दिन चूड़ा फोड़ने का प्रोग्राम होता है। इस प्रोग्राम में उत्तराधिकारी किन्नर के चूड़े तोड़े फोड़े जाते हैं। उसे विधवा बनाकर सफेद कपड़े पहनाए जाते है। सफेद साड़ी में उसे एक कोने में बैठा देते हैं। गले लगकर रोते है अलग अलग जिलों व अलग अलग राज्यों से आने वाले किन्नर, गुरू की मौत पर शोक मनाते है। सफेद कपड़ों में बैठे विधवा किन्नर से गले लगकर रोते है। फिर बाद में पानी से मुंह को धोते हैं। ये सिलसिला रात तक चलता है। जबतक मेहमान किन्नर आते रहते है तब तक उत्तराधिकारी किन्नर को सफेद कपड़ों में ही बैठाकर रखा जाता है। दूसरे दिन सुहागिन के कपड़े पहनाकर पगड़ी रस्म दूसरे दिन विधवा किन्नर को एक खुले चौक (जगह) पर बैठाया जाता है। बाहर से आए किन्नरों की मौजूदगी में उसे नहलाया जाता है। इस दौरान गीत बधाइयां गाई जाती है। किन्नर के सफेद कपड़ों को उतार कर दूसरे नए साफ कपड़े पहनाया जाते हैं।अलग-अलग जिलों राज्यों से आए गाद्दीपति किन्नर पगड़ी दस्तूर के रूप में कपड़े और लुगड़ी देते हैं। उसे अपने गुरु के सुहाग के तौर पर पगड़ी पहनाई जाती है। विधवा से सुहागिन किन्नर बनने के बाद उसे गुरू के इलाके ( क्षेत्र) का गद्दीपति घोषित कर दिया जाता है। तीसरे दिन चावल की रस्म पगड़ी रस्म के बाद अगले दिन चावल की रस्म निभाई जाती है। केसर युक्त चावल बनाकर दस्तूर में आए हुए सभी किन्नरों को बांटे जाते है। ये चावल लेकर किन्नर अपने-अपने जिलों व राज्यों में जाते है। फिर उन चावल को अपने अपने क्षेत्र में रहने वाले किन्नरों को न्योते के रूप में बांटा जाता है। न्यौता पाकर सभी किन्नर तय तारीख पर एक बार फिर इकठ्ठा होते है। उत्तराधिकारी बनने वाले किन्नर के निकाले जाने वाले जुलूस में शामिल होते है। जुलूस के दिन भंडारा किया जाता है। पूजा अर्चना की जाती है। गद्दीपति बनाने का कोई टाइम पीरियड नही जोधपुर की गाद्दीपति कांताबाई बुआ ने बताया कि किन्नर समाज के बड़े बूढ़े पंच यह देखते हैं कि कौन सा शिष्य अपने गुरु की सबसे ज्यादा सेवा करता है। उसी को गाद्दीपति बनने का मौका दिया जाता है। कई बार तो गुरू की मौत के काफी साल बाद तक गद्दीपति की घोषणा नहीं हो पाती। गद्दीपति की रस्म आयोजन में मोटा खर्चा होता है। आयोजन में देश के अलग अलग हिस्सों से किन्नर आते है। तीन दिनों तक उनके रहने खाने की व्यवस्था व आयोजन में काफी पैसा खर्च होता है। ये सारा खर्च उत्तराधिकारी को उठाना पड़ता है। ऐसे में उत्तराधिकारी को पैसों की व्यवस्था करने में कई साल लग जाते है। पैसे वाले किन्नर ये आयोजन जल्द कर लेते है। गादीपतियों का आभूषण दिए एमपी के मंदसौर से आई गाद्दीपति अनीता बाई किन्नर ने बताया कि कुछ वर्षों पहले गुमानपुरा की गाद्दीपति रेखा बाई की मौत हो गई थी। रेखा बाई की मौत के बाद उनके प्रमुख शिष्य मनीषा बाई को उत्तराधिकारी बनाया गया है। मनीषा बाई किन्नर ने बताया कि अलग अलग जगहो गाद्दीपतियों ​​​के रहने खाने व ठहरने के लिए शहर के गुमानपुरा इलाके में एक बड़ा सामुदायिक भवन किराए पर लिया। यहां सुरक्षा के लिए 24 घंटे 10-10 बाउंसर लगाए गए। कार्यक्रम खत्म होने के बाद बाहर से आए सभी किन्नरों को विदाई दी। गाद्दीपति किन्नरों को सोने चांदी के आभूषण दिए। मनीषा बाई किन्नर के पगड़ी रसम में कई इलाकों के गाद्दीपति पहुंचे। इनमें गुजरात के बोथरा माता, सूरत, अहमदाबाद, महाराष्ट्र के पुणे, मध्यप्रदेश के मंदसौर, उज्जैन, उत्तर प्रदेश के मथुरा, वृंदावन, जम्मू,बिहार, झारखंड, दिल्ली, हैदराबाद, राजस्थान से अजमेर, नसीराबाद, रावसर, ब्यावर, किशनगढ़, बीकानेर, सवाई माधोपुर, जोधपुर सहित कई जिलों से गाद्दीपति किन्नर और उनके चेले कोटा आए थे। सभी किन्नरों ने पगड़ी दस्तूर के बाद मनीषा बाई किन्नर का गुमानपुरा, विज्ञान नगर, छावनी, उद्योग नगर, सांगोद सहित अन्य इलाको का गाद्दीपति नियुक्त किया। मनीषा ने बताया उनकी दादी रेखा बाई (गुरु) इस इलाके की गाद्दीपति ​​​​​​​ थी। रेखा बाई की मौत के बाद उनके चेले सलाम बाई को गाद्दीपति ​​​​​​​बनाया गया। नवंबर 2021 में सलमा बाई (गुरु) की मौत हो गई थी। मै सलमा बाई की शिष्य हूं। उनकी मौत के बाद से इलाकों में कोई गाद्दीपति ​​​​​​​ नहीं था। अब पंच पटेल ने मिलकर मुझे गाद्दीपति ​​​​​​​ बनाया है।

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