बदलती जीवनशैली से बढ़ रहा फैटी लिवर का खतरा आयुर्वेद और पंचकर्म में है स्थाई समाधान: डॉ. अरोड़ा

अमृतसर | आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, अनियमित खान-पान और शारीरिक श्रम की कमी के कारण फैटी लिवर एक गंभीर वैश्विक समस्या बनता जा रहा है। अमृतसर के प्रसिद्ध आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. भूपिंदर सिंह अरोड़ा के अनुसार, अधिक तैलीय भोजन, मीठा और जंक फूड लिवर में वसा के जमाव को बढ़ा देते हैं, जिससे पाचन तंत्र प्रभावित होता है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण और लक्षण डॉ. अरोड़ा ने बताया कि आयुर्वेद में इसे ‘यकृत विकार’ माना गया है, जो मुख्य रूप से कफ एवं मेद दोष की वृद्धि तथा जठराग्नि (पाचन शक्ति) के मंद होने से होता है। इसके लक्षणों में थकान, अपच, पेट में भारीपन, गैस और वजन बढ़ना प्रमुख हैं। यकृत शरीर का वह मुख्य अंग है जो रक्त शुद्धि और मेटाबॉलिज्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डॉ. अरोड़ा के अनुसार फैटी लिवर के प्रबंधन में परहेज सबसे जरूरी है। शराब, फास्ट फूड और तले-भुने भोजन से दूर रहें। आहार में लौकी, तोरी, आंवला, हल्दी और छाछ को शामिल करें। गंभीर स्थिति में आयुर्वेद की पंचकर्म चिकित्सा (वमन, विरचन और बस्ती) विशेष प्रभावी सिद्ध होती है। नियमित योग, प्राणायाम और संतुलित दिनचर्या के समन्वय से लिवर को पुनः पूर्णतः स्वस्थ बनाया जा सकता है।

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