भास्कर न्यूज | कवर्धा/कुकदूर परीक्षा का नाम सुनते ही बच्चों के चेहरे उतर जाते हैं। इसी डर को खत्म करने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग हर साल प्री-बोर्ड परीक्षा कराता है। लेकिन सरकारी स्कूलों में यही परीक्षा अब छात्रों के लिए नई टेंशन बनती नजर आ रही है। दरअसल प्रायोगिक परीक्षा और प्री-बोर्ड परीक्षा एक साथ हो रही है। वह भी बिना किसी समीक्षा बैठक या पालक-शिक्षक सम्मेलन के। प्री-बोर्ड परीक्षा का उद्देश्य है कि बच्चों को बोर्ड परीक्षा जैसा माहौल दें। तैयारी का मूल्यांकन करें और कमियों में सुधार किया जाए। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। स्कूलों में 1 से 20 जनवरी तक प्रायोगिक परीक्षाएं चल रही हैं। इसी बीच प्री-बोर्ड परीक्षा भी शुरू कर दी गई। छात्रों का कहना है कि सुबह प्रैक्टिकल, फाइल और विवा की तैयारी करते हैं। दोपहर से प्री-बोर्ड की लिखित परीक्षा की। समझ नहीं आ रहा किस पर फोकस करें। जिस प्री-बोर्ड का उद्देश्य दबाव कम करना था, वही अब दोहरी परीक्षा बन गई है। आमतौर पर प्री-बोर्ड से पहले या बाद में विषयवार समीक्षा, कमजोर छात्रों की पहचान, पालक-शिक्षक-छात्र सम्मेलन होता है। लेकिन स्कूलों में अब तक कोई बैठक नहीं हुई है। न पालकों को बुलाया गया, न छात्रों की प्रगति पर चर्चा की गई। ऐसे में जब परीक्षा के पहले कोई भी कमियों की समीक्षा ही नहीं हुई, तो सुधार किस बात का होगा, यह समझ से परे है। बोर्ड परीक्षा को अब सिर्फ 1 महीने बचे हैं। कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षा 20 फरवरी से 10 मार्च और कक्षा 10वीं की 21 फरवरी से 7 मार्च तक चलेंगी। बोर्ड से पहले प्रिपरेशन लीव दी जाती है। लेकिन अगर प्री-बोर्ड के बाद भी समीक्षा और सुधार का समय नहीं मिला तो इसका असर बोर्ड परीक्षा परिणाम पर पड़ सकता है।


