पैरालंपिक में मेडल जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी दीपा मलिक ने अपनी पुस्तक ब्रिंग इट ऑन में अपने जीवन के संघर्षों को साझा करते हुए दावा किया है कि 2014 में मोदी सरकार आने के बाद भारत में खेलों में बहुत बदलाव हुआ है। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जुड़े अनुभव भी साझा किए। आप भी पढ़िए दैनिक भास्कर के साथ दीपा मलिक की खास बातचीत… सवाल – आपकी पहली किताब ब्रिंग इट ऑन में क्या खास है? जवाब – यह मेरे लिए बिल्कुल नया एक्सपीरियंस है। इससे मैं बहुत अच्छा फील कर रही हूं। मैंने जीवन के हर दौर में कुछ नया करने की ठानी थी। यह किताब भी मेरा ऐसा ही एक गोल था। इसे मैंने पूरा किया है। मेरी दिव्यांगता को 25 साल पूरे हो चुके हैं। ऐसे में इन 25 सालों में मैंने जीवन के उन सभी उतार-चढ़ाव जिनमें दिव्यांग के साथ महिला, मां, पत्नी, खिलाड़ी जैसे तमाम रूप को लेकर मैंने अपने जीवन से जुड़े पहलुओं और सफर को साझा किया है। सवाल – आपको दिव्यांग जीवन में 25 साल पूरे हो चुके हैं। इस दौरान आपको वक्त, हालात और लोगों के जज्बात में किस तरह का बदलाव देखने को मिला? जवाब – पिछले 25 साल में मेरे हालात में बहुत ज्यादा बदलाव हुआ है। हालात पहले के मुकाबले काफी सुधर चुके हैं। एक वक्त था, जब मुझे खुद की इस दिव्यांगता को लेकर गिलानी महसूस होती थी। खुद से काफी हीन भावना आती थी। शुरुआती दौर में मुझे काफी अजीब भी लगता था। उस वक्त जब कोई और मेरे कपड़े बदलता था। जब मुझे मल – मूत्र करने के लिए किसी और की मदद लेनी पड़ती थी। इसके बाद मेरी एक बेटी दिव्यांग है। यह सब मेरे जीवन में एक बड़े सदमे और धक्के जैसा था। मैंने उन हालातों में हार नहीं मानी। बल्कि, सबसे पहले मैंने खुद को संभाला। उस दौर में मैंने सीखा कि जब तक मैं खुद उदास रहूंगी, पूरी दुनिया मुझ पर सिंपैथी रखेगी। मुझे दया के भाव से देखेगी। वैसे भी दया का भाव कई बार अच्छा भी होता है। वह काफी नकारात्मक होता है। क्योंकि लोग उसमें आपकी स्थिति को लेकर सॉरी फील करते हैं। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे हालात से किसी को भी पीड़ा हो। मुझे लोगों के लिए और खुद के लिए दुख का नहीं। बल्कि, खुशी का कारण बनना था। मुझे आज भी लोगों की मदद की जरूरत पड़ती है। अब हालात बदल गए हैं। अब मैं मदद के लिए चार लोगों के घर की रोजी रोटी चलाती हूं। क्योंकि आज मैं सशक्त बन चुकी हूं। इसलिए मैं अपनी मदद के लिए ट्रेंड स्टाफ को रख सकती हूं। अब मैंने जीवन को खुशी से जीने की तकनीक को सीख लिया है। आज भी मैं लोगों की मदद लेती हूं। लेकिन मैं अपने जीवन से लोगों को मदद भी दे रही हूं। सोशल सर्विस से लेकर अच्छी मां, पत्नी और खिलाड़ी बनकर में देश का नाम रोशन कर रही हूं। सवाल – अपंग से दिव्यांगता का सफर तय करने में लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को आप क्या सलाह देना चाहती हैं? जवाब – मुझे लगता है कि लोग खुद से सीखना नहीं चाहते हैं। उन्हें नए शरीर को नए ढंग से काम में लेना आना चाहिए। आज देश में दिव्यांग लोगों को लेकर काफी तरह की पॉलिसी बन चुकी है। उन सभी लोगों को सरकार की मदद का फायदा उठाना चाहिए। सबसे पहले लोगों को खुद की यूनिक आईडी बनाने के साथ ही शिक्षा से लेकर अलग – अलग प्रावधान को समझना चाहिए। सिर्फ यही तक सीमित नहीं रहना है। बल्कि, वहां तक खुद की बात को पहुँचाना भी आना बेहद जरूरी है। सवाल – भारत के दिव्यांग खिलाड़ी लगातार शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। आखिर पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या बदलाव हुआ है? जवाब – यह भारत का सुनहरा बदलाव है, क्योंकि किसी भी देश की तरक्की उनकी महिलाएं, सीनियर सिटीजन और दिव्यांग लोगों को किस तरह रखा जा रहा है, इस बात पर निर्भर करती है। मुझे लगता है, खेल एक बड़ा प्रतिबिंब है। हमारे देश में अब दुनिया का सबसे बड़ा कैश अवॉर्ड खिलाड़ियों को दिया जाता है। प्रधानमंत्री खुद खिलाड़ियों से मिल उनकी हौसला अफजाई करते हैं। यह बदलाव देश को तरक्की के पथ पर आगे लेकर जा रहा है। सवाल – पैरालंपिक खेलों के खिलाड़ी लगातार शानदार प्रदर्शन कर मेडल जीत रहे हैं। लेकिन ओलिंपिक में उतने मेडल फिलहाल भारत नहीं जीत का रहा है। इसकी क्या वजह है? जवाब – ओलिंपिक में जीता हुआ एक मेडल भी हमारे देश में बहुत ज्यादा खास हो जाता है। वैसे भी सभी खिलाड़ियों की परफॉर्मेंस देश के लिए होती है। मुझे लगता है कि ओलिंपिक और पैरालंपिक को कंपेयर नहीं किया जाना चाहिए। जहां तक मेडल की बात है। जो भी पैराओलंपियन ने मेडल जीते हैं। ओलिंपिक में एक ही जैवलिन थ्रो होता है। पैरालंपिक में 12 से 20 तरह के जैवलिन थ्रो होते हैं। नंबर ऑफ कैटेगरी ज्यादा होने से ऑपच्यरुनिटीज भी बढ़ जाती है। इसलिए दोनों को कंपेयर करना ठीक नहीं है। सवाल – आप अपने जीवन में क्या कुछ बदलाव चाहती हैं जवाब – मैं चाहती हूं कि हमारे देश के हर स्कूल, प्रांगण चौराहे सड़कों के फुटपाथ पर दिव्यांगों के चलने के लिए आसानी आ जाए। मैं ऐसा भारत देखना चाहती हूं, जिसमें पब्लिक ट्रांसपोर्ट से बच्चा अपने घर से लेकर स्कूल तक आसानी से आ जा सके। मैं बहुत सारे सरकारी कार्यक्रमों में शामिल होकर देश में अपना सहयोग देने की कोशिश भी कर रही हूं। स्वच्छ भारत मिशन से लेकर विकसित भारत तक केंद्र सरकार की काफी योजनाओं का हिस्सा हूं। इसके साथ ही में भारत के पैरा खिलाड़ियों को लेकर काम कर रही हूं। ताकि देश और दुनिया के पैरा खिलाड़ियों को उचित मंच मुहैया हो सके। सवाल – आपने कांग्रेस से लेकर बीजेपी सरकार का कार्यकाल देखा है। इस दौरान पैरालंपिक खिलाड़ियों को लेकर क्या बदलाव हुआ है? जवाब – खिलाड़ियों को लेकर देश में 2014-15 के बाद पूरी तरह हालात बदल गए। देश में आज खिलाड़ियों से सीधे प्रधानमंत्री बात करते हैं। उन्हें हर संभव सुविधा उपलब्ध कराते हैं यह एक बड़ा बदलाव है। इससे खेल और खिलाड़ियों दोनों को मदद मिल रही है। सवाल – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत का कोई रोचक किस्सा जो आप साझा करना चाहे? जवाब – मैं प्रधानमंत्री की अमृत महोत्सव कमेटी की सदस्य भी रही हूं। जब भी प्रधानमंत्री मुझे मिलते हैं तो काफी अच्छे से मेरा नाम लेकर बातचीत करते हैं। यह मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी की बात है। जब मुझे पद्मश्री अवार्ड मिला था। तब प्रधानमंत्री ने मेरी व्हीलचेयर पकड़ कर मेरी माता जी तक मुझे पहुंचाया और उन्होंने मेरी मां से कहा था कि माताजी आपका धन्यवाद है। आपने ऐसी बेटी देश को दी है। आप यह मत सोचिएगा की पद्मश्री खेलों के लिए मिला है। जो बदलाव दीपा इस देश में लाई है। उस बदलाव की वजह से दीपा को यह सम्मान मिला है।


